श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context५६४ श्रीरामकृष्णवचनामृत ३ जुलाई, १८८४
श्रीरामकृष्ण – (बलराम के पिता और दूसरे भक्तों से) – वैष्णवों का एक ग्रन्थ है भक्तमाल, बड़ी अच्छी पुस्तक है। भक्तों की सब बातें उसमें हैं। परन्तु एक ही ढर्रे की है। एक जगह भगवती को विष्णुमन्त्र दिलाया है, तब पिण्ड छोड़ा है!
“‘मैंने वैष्णवचरण की बड़ी तारीफ करके सेजो बाबू के पास बुलवाया था। सेजो बाबू ने खूब खातिर की। चाँदी के बर्तन निकालकर उन्हीं में उनको जलपान कराया। फिर जब बातें होने लगीं, तब उसने सेजो बाबू के सामने कह डाला – ‘हमारे केशव-मन्त्र के बिना कुछ होने-जाने का नहीं।’ सेजो बाबू देवी के उपासक थे। इतना सुनते ही उनका मुँह लाल हो गया। मैंने वैष्णव चरण का हाथ दबा दिया।
“सुना है कि श्रीमद्भागवत जैसे ग्रन्थ में भी इस तरह की बातें हैं। ‘केशव का मन्त्र बिना लिये भवसागर के पार जाना कुत्ते की पूँछ पकड़कर महासमुद्र पार करना है।’ भिन्न-भिन्न मतवालों ने अपने ही मत को प्रधान बतलाया है।
“शाक्त भी वैष्णवों को छोटा सिद्ध करने की चेष्टा करते हैं। श्रीकृष्ण भव-नदी के नाविक हैं, पार कर देते हैं, इस पर शाक्त लोग कहते हैं – ‘हाँ, यह बिलकुल ठीक है, क्योंकि हमारी माँ राजराजेश्वरी हैं, भला वे कभी खुद आकर पार कर सकती हैं? – कृष्ण को पार करने के लिए नौकर रख लिया है।’ (सब हँसते हैं।)
“अपने मत पर लोग अहंकार भी कितना करते हैं! उस देश (कामारपुकुर), श्यामबाजार आदि स्थानों में कोरी बहुत हैं। उनमें बहुत से वैष्णव हैं। वे बड़ी लम्बी लम्बी बातें मारते हैं। कहते हैं, ‘अरे ये किस विष्णु को मानते हैं – पाता (पालनकर्ता) विष्णु को? – उसे तो हम लोग छुयेंगे भी नहीं! कौन शिव? – हम लोग तो आत्माराम शिव – आत्मारामेश्वर शिव को मानते हैं।’ कोई दूसरा बोल उठा, ‘तुम लोग समझाओ भी तो, किस हरि को मानते हो?’ इधर कपड़े बुनते हैं और उधर इतनी लम्बी लम्बी बातें!
“रति की माँ, रानी कात्यायनी की सहचरी है; – वैष्णवचरण के दल की है, कट्टर वैष्णवी। यहाँ बहुत आया-जाया करती थी। भक्ति का खूब दिखलावा था, ज्योंही मुझे उसने काली का प्रसाद पाते हुए देखा कि भागी।
“जिसने समन्वय किया है, वही मनुष्य है। अधिकतर आदमी एक खास ढर्रे के होते हैं। परन्तु मैं देखता हूँ, सब एक हैं। शाक्त, वैष्णव, वेदान्त मत, सब उसी एक को लेकर हैं; जो साकार हैं वे ही निराकार हैं, उन्हीं के अनेक रूप हैं। ‘निर्गुण मेरे पिता हैं, सगुण मेरी माँ; मैं किसकी निन्दा करूँ और किसकी वन्दना, दोनों ही पलड़े भारी हैं।’ वेदों में जिनकी बात है उन्हीं की बात तन्त्रों में है और पुराणों में भी उसी एक सच्चिदानन्द की बातें हैं। जो नित्य हैं, लीला भी उन्हीं की है।
“वेदों में है – ॐ सच्चिदानन्द ब्रह्म। तन्त्रों में है – ॐ सच्चिदानन्दः शिवः –