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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

DevanagariHindipublished711 pages

Page 566 of 711

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Page 566

२५ जून, १८८४ परिच्छेद ८४ ५४३

यशोदा को विश्वास था, मैं अगर कृष्ण की देख-रेख न करूँगी, तो और कौन करेगा? कभी तो भगवान चुम्बक हैं और भक्त सुई – भगवान भक्त को खींच लेते हैं; और कभी भक्त चुम्बक और भगवान सुई, भक्त का इतना आकर्षण होता है कि उसके प्रेम को देख, मुग्ध होकर भगवान उसके पास खिंचे चले जाते हैं।”

श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर लौटनेवाले हैं। नीचे के बैठकखाने के दक्षिण ओर वाले बरामदे में आकर खड़े हुए हैं। ईशान आदि भक्तगण भी खड़े हैं। बातों ही बातों में श्रीरामकृष्ण ईशान को बहुत से उपदेश दे रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – (ईशान से) – संसार में रहकर जो उन्हें पुकारता है, वह वीर भक्त है। भगवान कहते हैं, जिसने संसार छोड़ दिया है, वह मुझे पुकारेगा ही, मेरी सेवा करेगा ही, उसकी इसमें बड़ाई क्या है? वह अगर मुझे न पुकारे तो लोग उसे धिक्कारेंगे, पर जो संसार में रहकर भी मुझे पुकारता है, बीस मन का पत्थर हटाकर मुझे देखता है, वही धन्य है, वही बहादुर है, वही वीर है।

भागवती पण्डित – शास्त्रों में तो यही बात है – धर्मव्याध और पतिव्रता की कथा में। तपस्वी ने सोचा था, मैंने कौए और बगुले को भस्म कर डाला है – मेरा स्थान बड़ा ऊँचा है। वह पतिव्रता के घर गया था। पति पर उसकी इतनी भक्ति थी कि वह दिनरात उसी की सेवा किया करती थी। पति के घर आने पर पैर धोने के लिए उसे पानी देती, यहाँ तक कि अपने बालों से उसके पैर पोंछती थी। तपस्वी अतिथि होकर गये थे। भिक्षा मिलने में देर हो रही थी, इस पर चिल्लाकर कह उठे, तुम्हारा भला न होगा। पतिव्रता ने उसी समय भीतर से कहा, 'यह कौए और बगुले को भस्म करना थोड़े ही है। महाराज, जरा ठहरो, मैं स्वामी की सेवा कर लूँ, तब तुम्हारी भी पूजा करूँगी।'

“धर्मव्याध के पास कोई ब्रह्मज्ञान के लिए गया था। व्याध पशुओं का मांस बेचता था, परन्तु पिता-माता को ईश्वर समझकर दिनरात उनकी सेवा करता था। जो मनुष्य ब्रह्मज्ञान के लिए उसके पास गया था, वह तो उसे देखकर दंग रह गया – सोचने लगा, यह व्याध मांस बेचता है और संसारी मनुष्य है, यह भला मुझे क्या ब्रह्मज्ञान दे सकता है? परन्तु वह व्याध पूर्ण ज्ञानी था।”

श्रीरामकृष्ण अब गाड़ी पर चढ़ेंगे। ईशान तथा अन्य भक्तगण पास ही खड़े हैं, उन्हें गाड़ी पर चढ़ा देने के लिए। श्रीरामकृष्ण फिर बातों में ईशान को उपदेश देने लगे –

“चींटी की तरह संसार में रहो। इस संसार में नित्य और अनित्य दोनों मिले हुए हैं। बालू के साथ शक्कर मिली हुई है। चींटी बनकर चीनी का भाग ले लेना।

“जल और दूध एक साथ मिले हुए हैं। चिदानन्द-रस और विषय-रस। हंस की तरह दूध का अंश लेकर जल का भाग छोड़ देना।

“पनडुब्बी चिड़िया की तरह रहो – परों में पानी लग जाय तो झाड़कर निकाल