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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished711 pages

Page 543 of 711

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Page 543

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५२० श्री रामकृष्णवचनामृत १५ जून, १८८४

है। सतोगुण (भक्ति, विवेक, वैराग्य, दया आदि सब) के बिना ईश्वर नहीं मिल सकते। रजोगुण में कर्म का आडम्बर होता है, इसीलिए रजोगुण से तमोगुण आ जाता है। ज्यादा कर्म में फँसने पर ही ईश्वर को मनुष्य भूल जाता है। तब कामिनी-कांचन में भी आसक्ति बढ़ जाती है।

"परन्तु कर्मों का बिलकुल त्याग कोई नहीं कर सकता। तुम्हारी प्रकृति खुद तुमसे कर्म करा लेगी, तुम अपनी मर्जी से करो या न करो। इसीलिए कहा है, अनासक्त होकर कर्म करो, अर्थात् कर्म-फल की आकांक्षा न करो; जैसे, पूजा, जप, तप, यह सब कर रहे हो, परन्तु सम्मान या पुण्य के लिए नहीं।

"इस तरह अनासक्त होकर कर्म करने का ही नाम कर्मयोग है। यह बड़ा कठिन है। एक तो कलिकाल है, सहज ही आसक्ति आ जाती है। सोच रहा हूँ, अनासक्त होकर काम कर रहा हूँ, परन्तु न जाने किधर से आसक्ति आ जाती है, समझ में नहीं आता। कभी पूजा और महोत्सव किया या बहुत से कंगालों को खिलाया, सोचा, अनासक्त होकर मैं यह सब कर रहा हूँ, परन्तु फिर भी न जाने किधर से लोक-सम्मान की इच्छा आ जाती है, पता नहीं। बिलकुल अनासक्त होना उसके लिए सम्भव है जिसे ईश्वर के दर्शन हो चुके हैं।"

एक भक्त – जिन्होंने ईश्वर को प्राप्त नहीं किया, उनके लिए क्या उपाय है? क्या वे विषय-कर्म छोड़ दें?

श्रीरामकृष्ण – कलिकाल के लिए भक्तियोग है, नारदीय भक्ति। ईश्वर का नाम-गुणगान और व्याकुल होकर प्रार्थना करना – 'हे ईश्वर, मुझे ज्ञान दो, भक्ति दो, मुझे दर्शन दो।' कर्मयोग बड़ा कठिन है। इसीलिए प्रार्थना करनी चाहिए, 'हे ईश्वर, मेरे कर्म घटा दो और जितने कर्म तुमने रखे हैं, उन्हें तुम्हारी कृपा से अनासक्त होकर कर सकूँ और अधिक कर्म लपेटने की मेरी इच्छा न हो!'

"कर्म कोई छोड़ नहीं सकता। 'मैं सोच रहा हूँ', 'मैं ध्यान कर रहा हूँ' – ये भी कर्म हैं। भक्ति पा लेने पर विषयकर्म आप ही आप घट जाते हैं। तब वे अच्छे नहीं लगते। मिश्री का शरबत मिल जाय, तो फिर सीरा कौन पीता है?"

एक भक्त – विलायत के आदमी 'कर्म करो – कर्म करो' कहा करते हैं, तो क्या कर्म जीवन का उद्देश्य नहीं है?

श्रीरामकृष्ण – जीवन का उद्देश्य है ईश्वर-लाभ। कर्म तो आदिकाण्ड है, वह जीवन का उद्देश्य नहीं हो सकता। निष्काम कर्म एक उपाय हो सकता है, परन्तु वह भी उद्देश्य नहीं हैं।

"शम्भू कहता था, अब ऐसा आशीर्वाद दीजिये कि जो रुपये हैं, उनका सद्व्यय कर सकूँ। अस्पताल, दवाखाना, रास्ताघाट, कुआँ इनके तैयार करने में लग जाय। मैंने

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar