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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 538 of 711

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Page 538

१५ जून, १८८४ | परिच्छेद ८२ | ५१५

“देखा नहीं, ईश्वर उसी वंश में अवतार लेते हैं जहाँ सरलता पायी जाती है। दशरथ कितने सरल थे! नन्द – श्रीकृष्ण के पिता – कितने सरल थे! अब भी आदमी कहते हैं, अहा! कैसा सरल है – मानो नन्द घोष हो।

(निरंजन से) “देख, तेरे मुँह पर स्याही आ गयी है, तू आफिस का काम करता है न? इसीलिए आफिस में हिसाबकिताब करना पड़ता होगा, और भी कितने ही तरह के काम होंगे! सब समय सोचना पड़ता होगा।

“संसारी आदमी जिस तरह नौकरी करते हैं, तू भी वैसे ही करता है, परन्तु कुछ भेद है। तूने अपनी माँ के लिए नौकरी की है। माँ गुरु हैं, ब्रह्ममयी की मूर्ति हैं अगर बीबी और बच्चों के लिए तू नौकरी करता तो मैं कहता ‘तुझे धिक्कार है, सौ बार धिक्कार है।’

(मणि मल्लिक से) “देखो, यह लड़का बड़ा सरल है, परन्तु आजकल कुछ झूठ बोलने लगा है। यही इतना दोष है। उस दिन कह गया, आऊँगा, परन्तु फिर नहीं आया। (निरंजन से) इसी पर राखाल कहता था, एँड़ेदाह में आकर तूने क्यों नहीं भेंट की?”

निरंजन – मैं एँड़ेदाह में बस दो दिनों के लिए आया था।

श्रीरामकृष्ण – (निरंजन से) – ये हेडमास्टर हैं। तुझसे मिलने गये थे। मैने भेजा था। (मास्टर से) क्या उस दिन बाबूराम को मेरे पास तुमने भेजा था?

श्रीरामकृष्ण पश्चिमवाले कमरे में दो-चार भक्तों के साथ बातचीत कर रहे हैं। उसी कमरे में कुछ टेबिल और कुर्सियाँ इकट्ठी की हुई रखी थीं। श्रीरामकृष्ण टेबिल के सहारे खड़े हैं।

श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – अहा! गोपियों का कैसा अनुराग है! तमाल देखकर प्रेम से विह्वल हो गयीं – एकदम प्रेमोन्माद! श्रीराधा की विरहाग्नि इतनी प्रचण्ड थी कि आँख के आँसू भी उसके ताप में सूख जाते थे। पानी बनने से पहले ही वाष्प होकर उड़ जाते थे। कभी कभी दूसरे को उनके भाव का कुछ पता ही नहीं चलता था। बड़े तालाब में हाथी के धँसने पर भी दूसरों को पता नहीं चलता।

मास्टर – जी हाँ। गौरांग का भी यही हाल था। वन देखकर उन्होंने उसे वृन्दावन सोचा था और समुद्र देखकर यमुना।

श्रीरामकृष्ण – अहा! उस प्रेम का एक बूँद भी अगर किसी को हो – कैसा अनुराग! कैसा प्यार! सिर्फ सोलह आने अनुराग नहीं, पाँच चवन्नी और पाँच आने। प्रेमोन्माद इसी का नाम है। बात यह है कि उन्हें प्यार करना चाहिए। तो फिर तुम चाहे जिस मार्ग पर रहो, साकार पर ही विश्वास करो या निराकार पर – ईश्वर मनुष्य के रूप में अवतार लेते हैं इस बात पर चाहे विश्वास करो या न करो – उन पर अनुराग रहने से ही काफी है। तब वे खुद समझा देंगे कि वे कैसे हैं।

“अगर पागल ही होना है, तो संसार की चीज लेकर क्यों पागल होते हो? पागल