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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished711 pages

Page 531 of 711

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Page 531

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५०८ श्रीरामकृष्णवचनामृत २५ मई, १८८४

गये हैं। गोपाल ने मास्टर से कहा, 'वे कह गये हैं, अपना छाता कमरे में रख देना।' पंचवटी में कीर्तन का आयोजन होने लगा। श्रीरामकृष्ण आकर बैठे। सहचरी गा रही है। भक्तगण चारों ओर बैठे हैं, कोई कोई खड़े भी हैं।

कल शनिवार अमावस्या थी। जेठ का महीना है। आज ही से मेघ दिखलायी देने लगे। एकाएक आँधी भी चल पड़ी। श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ अपने कमरे में चले आये। निश्चय हुआ कि कीर्तन उसी कमरे में होगा।

श्रीरामकृष्ण – (सींती के गोपाल से) – क्यों जी छाता ले आये हो?

गोपाल – जी नहीं, गाना सुनते ही सुनते भूल गया।

छाता पंचवटी में पड़ा हुआ है, गोपाल जल्दी से लेने के लिए चले गये।

श्रीरामकृष्ण – मै इतना लापरवाह तो हूँ, फिर भी इस दरजे को अभी नहीं पहुँचा।

"राखाल ने एक जगह निमन्त्रण की बात पर तेरह तारीख को कह दिया ग्यारह तारीख!

"और गोपाल आखिर गौओं के पाल (समूह) ही तो हैं! (सब हँसते हैं।)

"वही, जो एक सुनारों की कहानी है – एक कहता है 'केशव', दूसरा कहता है 'गोपाल', तीसरा कहता है 'हरि', चौथा कहता है 'हर'! उसमें, उस गोपाल का अर्थ है, गौओं का पाल (समूह)!" (सब हँसते हैं।)

सुरेन्द्र गोपाल को लक्ष्य करके हँसते हुए कह रहे हैं – 'कान्हा कहाँ हैं?'

(३)

कीर्तन करनेवाली गौरांग के संन्यास का कीर्तन गा रही है। श्रीरामकृष्ण गौरांग-संन्यास का कीर्तन सुनते सुनते खड़े होकर समाधिमग्न हो गये। उसी समय भक्तों ने उनके गलें में फूलों की माला डाल दी। भवनाथ और राखाल श्रीरामकृष्ण को पकड़े हुए हैं कि कहीं गिर न जायँ। श्रीरामकृष्ण उत्तर की ओर मुँह किये हुए हैं। विजय, केदार, राम, मास्टर, मनमोहन, लाटू आदि भक्तगण मण्डलाकार उन्हें घेरकर खड़े हैं।

कृष्ण ही अखण्ड सच्चिदानन्द हैं वे ही जीव-जगत् हैं

धीरे धीरे समाधि छूट रही है। श्रीरामकृष्ण सच्चिदानन्द श्रीकृष्ण से बातचीत कर रहे हैं। 'कृष्ण' इस नाम का एक एक बार उच्चारण कर रहे हैं। कभी कभी साफ उच्चारण भी नहीं होता। कह रहे हैं – "कृष्ण! कृष्ण! सच्चिदानन्द! – कहाँ हो, आजकल तुम्हारा रूप देखने को नहीं मिलता! अब तुम्हें भीतर भी देख रहा हूँ और बाहर भी। जीव, जगत्, चौबीस तत्त्व सब तुम्हीं हो। मन, बुद्धि सब तुम्हीं हो। गुरु के प्रणाम में है –

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar