Skip to content
SarvaKosh
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished711 pages

Page 525 of 711

Read in context
Page 525

५०२ श्रीरामकृष्णवचनामृत २४ मई, १८८४

हरि – अच्छा, कुछ लोगों को उन्हें प्राप्त करने में उतना विलम्ब क्यों होता है?

श्रीरामकृष्ण – बात क्या है, जानते हो? – भोग और कर्म समाप्त हुए बिना व्याकुलता नहीं आती। वैद्य कहता है, 'दिन बीतने दो, उसके बाद साधारण औषधि से ही लाभ होगा।'

"नारद ने राम से कहा, 'राम! तुम अयोध्या में बैठे हो, रावण का वध कैसे होगा? तुम तो उसी के लिए अवतीर्ण हुए हो।' राम ने कहा, 'नारद! समय होने दो, रावण का कर्मक्षय होने दो, तब उसके वध की तैयारी होगी।' "

श्रीरामकृष्ण की विज्ञानि स्थिति

हरि – अच्छा, संसार में इतने दुःख क्यों हैं?

श्रीरामकृष्ण – यह संसार उनकी लीला है, खेल की तरह। इस लीला में सुख-दुःख, पाप-पुण्य, ज्ञान-अज्ञान, भला-बुरा सब कुछ है; दुःख, पाप ये सब न रहने से लीला नहीं चलती।

"लुका-लुकौअल खेल में खूँटी छूना पड़ता है। खेल के प्रारम्भ में ही ढाई छूने पर वह सन्तुष्ट नहीं होती। ईश्वर (ढाई) की इच्छा है कि खेल कुछ देर तक चलता रहे। उसके बाद – 'लाखों पतंगों में से दो एक कटते हैं, माँ, तब तुम हँसती हुई हथेली बजाती हो!'

"अर्थात् ईश्वर का दर्शन करके एक-दो व्यक्ति मुक्त हो जाते हैं – बहुत तपस्या के बाद, उनकी कृपा से। तब माँ आनन्द से हथेली बजाती है – 'ओहो! कट गया' यह कहकर।"

हरि – परन्तु इसी खेल में तो हमारे प्राण जो निकलते हैं!

श्रीरामकृष्ण – (हँसकर) – तुम कौन हो कहो न! ईश्वर ही सब कुछ बने हुए हैं – माया, जीव, जगत्, चौबीस तत्त्व।

"साँप बनकर काटता हूँ, और ओझा बनकर झाड़-फूक करता हूँ। वे विद्या, अविद्या दोनों ही बने हुए हैं। अविद्या-माया द्वारा अज्ञानी जीव बने हुए हैं, विद्या-माया द्वारा तथा गुरु के रूप में ओझा बनकर झाड़-फूक कर रहे हैं।

"अज्ञान, ज्ञान, विज्ञान। ज्ञानी देखते हैं, वे ही कर्ता हैं। सृष्टि, स्थिति तथा संहार कर रहे हैं। विज्ञानी देखता है कि वे ही यह सब बने हुए हैं।

"महाभाव, प्रेम होने पर देखता है, उनके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।

"भाव के सामने भक्ति फीकि है। भाव पकने पर महाभाव, प्रेम!

(बन्योपाध्याय के प्रति) "क्या तुम अभी भी ध्यान के समय घण्टे का शब्द सुनते हो?"

बन्यो. – रोज उसी शब्द को सुनता हूँ। फिर रूप का दर्शन! एक बार मन द्वारा