श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context४९८ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २४ मई, १८८४
“स्त्रियाँ मेरी माँ का एक-एक रूप हैं न; इसीलिए मैं उनका कष्ट नहीं देख सकता। जगन्माता का एक-एक रूप। खाकर आओगी, आनन्द में रहोगी।”
यह कहकर श्री रामलाल को आदेश दिया कि वह उन बहुओं को जलपान कराये। फलहारिणी पूजा का प्रसाद – लूची, तरहतरह के फल, ग्लास ग्लास भर शरबत और मिठाई आदि उन्होंने ग्रहण किया।
श्रीरामकृष्ण ने कहा, “तुम लोगों ने कुछ खा लिया तो अब मेरा मन शान्त हुआ। मैं स्त्रियों को उपवासी नहीं देख सकता।”
श्रीरामकृष्ण शिवमन्दिर की सीढ़ी पर बैठे हैं। दिन के पाँच बजे का समय होगा। पास ही अधर, डाक्टर, निताई, मास्टर आदि दो-एक भक्त बैठे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (भक्तों के प्रति) – देखो, मेरा स्वभाव बदलता जा रहा है।
अब कुछ गुह्य बातें कहने के उद्देश्य से एक सीढ़ी नीचे उतरकर भक्तों के पास जा बैठे।
मनुष्य में ईश्वर का सब से अधिक प्रकाश: अवतारतत्त्व
श्रीरामकृष्ण – तुम लोग भक्त हो, तुमसे कहने में हानि नहीं – आजकल मुझे ईश्वर के चिन्मय रूप का दर्शन नहीं होता। साकार नर-रूप में उनका दर्शन करता हूँ। ईश्वर के रूप का दर्शन, स्पर्श तथा आलिंगन करना मेरा स्वभाव है। अब ईश्वर मुझसे कह रहे हैं, ‘तुमने देह धारण की है, साकार नर-रूपों के साथ आनन्द करो।’
“वे तो सभी भूतों में विद्यमान हैं, परन्तु मनुष्य में अधिक प्रकट हैं।
“मनुष्य क्या कम है जी! ईश्वर का चिन्तन कर सकता है, अनन्त का चिन्तन कर सकता है; दूसरा कोई प्राणी ऐसा नहीं कर सकता।
“दूसरे प्राणियों में, वृक्षलताओं में तथा सर्व भूतों में वे हैं, परन्तु मनुष्य में उनका अधिक प्रकाश है।
“अग्नि-तत्त्व सर्व भूतों में है, सब चीजों में है, परन्तु लकड़ी में अधिक प्रकट है।
“राम ने लक्ष्मण से कहा था, ‘भाई, देखो हाथी इतना बड़ा जानवर है, परन्तु ईश्वर का चिन्तन नहीं कर सकता।’
“फिर अवतार में अधिक प्रकट हैं। राम ने लक्ष्मण से कहा था, ‘भाई, जिस मनुष्य में रागा-भक्ति देखो – भाव में हँसता है, रोता है, नाचता है – वहीं पर मैं हूँ।’ ”
श्रीरामकृष्ण चुपचाप बैठे हैं। थोड़ी देर बाद फिर बातचीत करने लगे।
श्रीरामकृष्ण – अच्छा, केशव सेन बहुत आता था। यहाँ पर आकर तो वह बहुत बदल गया। हाल में तो उसमें बहुत कुछ विशेषता आ गयी थी। यहाँ दलबल के साथ कई बार आया था। फिर अकेले आने की इच्छा थी। केशव का पहले वैसा साधुसंग नहीं हुआ