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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 517 of 711

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Page 517

४९४ श्रीरामकृष्णवचनामृत २४ मई, १८८४

इसीलिए इस बुद्धि के द्वारा यह सब समझा नहीं जाता। साधुसंग करना होता है। वैद्य के साथ रहते रहते नाड़ी परखना आ जाता है।

विद्या – जी, अब समझा।

श्रीरामकृष्ण – तपस्या चाहिए, तब वस्तु की प्राप्ति होगी। शास्त्र के श्लोकों को रट लेने से भी कुछ न होगा। 'गांजा गांजा' मुँह से कहने से नशा नहीं होता। गांजा पीना पड़ता है।

“ईश्वर-दर्शन की बात लोगों को समझायी नहीं जा सकती। पाँच वर्ष के बालक को पति-पत्नी के मिलने के आनन्द की बात समझायी नहीं जा सकती।”

विद्या – जी, आत्मदर्शन किस उपाय से हो सकता है?

इसी समय राखाल कमरे में भोजन करने बैठ रहे थे। परन्तु वहाँ अनेक लोग हैं, इसलिए सोच-विचार कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण आजकल राखाल का गोपाल-भाव से पालन कर रहे हैं। – ठीक मानो माँ यशोदा का वात्सल्य-भाव।

श्रीरामकृष्ण (राखाल के प्रति) – खा न रे! ये लोग नहीं तो उठकर एक ओर खड़े हो जायँ। (एक भक्त के प्रति) राखाल के लिए बर्फ रखो। (राखाल के प्रति) तू फिर बन-हुगली जायगा? धूप में न जाना।

राखाल भोजन करने बैठे। श्रीरामकृष्ण फिर विद्या का अभिनय करनेवाले लड़के के साथ वार्तालाप कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – (विद्या के प्रति) – तुम सब ने मन्दिर में प्रसाद क्यों नहीं लिया? यहीं पर भोजन करते।

विद्या – जी, सभी की राय तो एक-सी नहीं है, इसीलिए अलग रसोई बन रही है। सभी लोग अतिथिशाला में भोजन करना नहीं चाहते।

राखाल भोजन करने बैठे हैं; श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ बरामदे में बैठकर फिर बातचीत कर रहे हैं।

(२)

आत्मदर्शन का उपाय

श्रीरामकृष्ण – (विद्या अभिनेता के प्रति) – आत्मदर्शन का उपाय है व्याकुलता। मन, वचन और कर्म से उन्हें पाने की चेष्टा। जब देह में काफी पित्त जम जाता है, तो सभी चीजें पीली दिखती हैं; पीले के अतिरिक्त दूसरा कोई रंग नहीं दिखता।

“तुम नाटकवालों में जो लोग केवल औरतों का काम करते हैं, उनका प्रकृतिभाव हो जाता है। औरतों का चिन्तन करके औरतों की तरह चलना-फिरना, सभी कुछ उनके समान हो जाता है। इसी प्रकार रात-दिन ईश्वर का चिन्तन करने पर उन्हीं का स्वभाव प्राप्त