श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context४८६ श्रीरामकृष्णवचनामृत ५ अप्रैल, १८८४
“मैं वैष्णवचरण को सेजो बाबू* के पास ले गया था। वैष्णवचरण वैरागी है, बड़ा पण्डित है, परन्तु कट्टर वैष्णव है। इधर सेजो बाबू भगवती के भक्त हैं। अच्छी बातें हो रही थीं, इसी समय वैष्णवचरण ने कह डाला, ‘मुक्ति देनेवाले तो एक केशव ही हैं।’ केशव का नाम लेते ही सेजो बाबू का मुँह लाल हो गया और वे बोले, ‘तू साला!’ (सब हँस पड़े।) मथुर बाबू शाक्त जो थे! उनके लिए यह कहना स्वाभाविक ही था। मैंने इधर वैष्णवचरण को खींच लिया।
“जितनें आदमियों को देखता हूँ, धर्म-धर्म करके एक दूसरे से झगड़ा किया करते हैं। हिन्दू, मुसलमान, ब्राह्मसमाजी, शाक्त, वैष्णव, शैव, सब एक दूसरे से लड़ाई-झगड़ा करते हैं यह बुद्धिमानी नहीं है। जिन्हें कृष्ण कहते हो, वे ही शिव, वे ही आद्याशक्ति हैं, वे ही ईसा हैं और वे ही अल्लाह हैं। एक राम उनके हजार नाम।
“वस्तु एक ही है, केवल उसके नाम अलग अलग हैं। सब लोग एक ही वस्तु की चाह कर रहे हैं। अन्तर इतना ही है कि देश अलग है, पात्र अलग और नाम अलग। एक तालाब में बहुत से घाट हैं। हिन्दू एक घाट से पानी ले रहे हैं, घड़े में भरकर कहते हैं, ‘जल’। मुसलमान एक दूसरे घाट से पानी भर रहे हैं, चमड़े के बैग में – कहते हैं, ‘पानी’। क्रिस्टान तीसरे घाट से पानी ले रहे हैं – वे कहते हैं ‘वाटर’ (Water)। (सब हँसते हैं।)
“अगर कोई कहे, नहीं यह चीज जल नहीं है, यह पानी है या वाटर नहीं जल है, तो यह हँसी की ही बात होगी। इसीलिए दल, मतान्तर और झगड़े होते हैं। धर्म के नाम पर लठ्ठम लट्ठा, मार-काट? यह सब अच्छा नहीं है। सब उन्हींके पथ पर जा रहे हैं। आन्तरिकता होने पर, व्याकुलता आने पर – उन्हें मनुष्य प्राप्त करेगा ही। (मणि से) तुम यह सुनते जाओ – वेद, पुराण, तन्त्र-शास्त्र उन्हींको चाहते हैं; वे किसी दूसरे को नहीं चाहते। सच्चिदानन्द बस एक ही हैं। जिन्हें वेदों में ‘सच्चिदानन्द ब्रह्म’ कहा है, तन्त्र में उन्हींको ‘सच्चिदानन्द शिव’ कहा है, उन्हींको उधर पुराणों में ‘सच्चिदानन्द कृष्ण’ कहा है।”
श्रीरामकृष्ण ने सुना, राम घर में कभी कभी स्वयं भोजन पकाते हैं।
श्रीरामकृष्ण – (मणि से) – क्या तुम भी अपने हाथ से भोजन पकाते हो?
मणि – जी नहीं।
श्रीरामकृष्ण – कोशिश करके देखो न जरा, थोड़ा सा गो-घृत छोड़ कर भोजन किया करो। शरीर और मन शुद्ध जान पड़ने लगेंगे।
* रानी रासमणि के दामाद श्रीयुत मथुरानाथ विश्वास।