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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 497 of 711

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Page 497

४७४ श्रीरामकृष्णवचनामृत २३ मार्च, १८८४

मणि सेन हठयोगी की बात सुनकर कह रहे हैं - “हठयोगी किसे कहते हैं? हॉट (hot) का तो अर्थ है गरम!”

मणि सेन के डॉक्टर के सम्बन्ध में श्रीरामकृष्ण ने पीछे से कहा - “उसे जानता हूँ। यदु मल्लिक से मैंने कहा भी था, यह तुम्हारा डॉक्टर बिलकुल खोखला है - अमुक डॉक्टर से भी इसकी बुद्धि मोटी है!”

अभी सन्ध्या नहीं हुई है। श्रीरामकृष्ण अपने आसन पर बैठकर मास्टर से बातचीत कर रहे हैं। वे खाट के पास पाँवपोश पर पश्चिम की ओर मुँह करके बैठे हैं; इधर महिमाचरण पश्चिमवाले गोल बरामदे में बैठकर मणि सेन के डॉक्टर के साथ उच्च स्वर में शास्त्रालाप कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण अपने आसन से सुन रहे हैं और कुछ हँसकर मास्टर से कह रहे हैं - “देखो, झाड़ रहा है; रजोगुण है। रजोगुण होने से कुछ पाण्डित्य दिखलाने और लेक्चर देने की इच्छा होती है। सतोगुण से मनुष्य अन्तर्मुख हो जाता है, खुद के गुण छिपा रखने की इच्छा होती है। पर आदमी खासा है - ईश्वर के नाम पर कितना उत्साह है!”

अधर आये, प्रणाम किया और मास्टर के पास बैठ गये। श्रीयुत अधर सेन डिप्टी मैजिस्ट्रेट हैं। उम्र तीस साल की होगी। दिन भर ऑफिस का काम करके, कितने ही दिनों से शाम के बाद श्रीरामकृष्ण के पास आ रहे हैं। इनका मकान कलकत्ते के शोभा बाजार बनियाटोले में है। कई दिनों से ये आये नहीं थे।

श्रीरामकृष्ण – क्यों जी, इतने दिन क्यों नहीं आये?

अधर – कई कामों में फँसा था। स्कूलों की सभाओं और कुछ दूसरी मीटिंग में भी जाना पड़ा था।

श्रीरामकृष्ण – मीटिंग, स्कूल लेकर और सब बिलकुल भूल गये थे।

अधर – (विनयपूर्वक) – जी, नहीं, काम के कारण बाकी सब बातें दबी सी पड़ी थीं। आपका हाथ कैसा है?

श्रीरामकृष्ण – यह देखो, अभी तक अच्छा नहीं हुआ। प्रताप की दवा खा रहा था।

कुछ देर बाद श्रीरामकृष्ण एकाएक अधर से कहने लगे – “देखो, यह सब अनित्य है। मीटिंग, स्कूल, ऑफिस, यह सब अनित्य है। ईश्वर ही वस्तु है और सब अवस्तु। बस मन लगाकर उन्हीं की आराधना करनी चाहिए।”

अधर चुप है।

श्रीरामकृष्ण – यह सब अनित्य है। शरीर अभी अभी है, अभी अभी नहीं। जल्दी उन्हें पुकार लेना चाहिए।

“तुम लोगों को सब त्याग करने की आवश्यकता नहीं है। कछुए की तरह संसार में रहो। कछुआ स्वयं तो पानी में भोजन की तलाश करता है, परन्तु अपने अण्डे किनारे