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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 494 of 711

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Page 494

२३ मार्च, १८८४  परिच्छेद ७८  ४७१

“उस स्त्री का स्वामी कन्धे पर अँगोछा डाले हुए नहाने जा रहा था। उसने कहा, अरी, सुन, त्याग करने की शक्ति उसमें नहीं है, थोड़ा थोड़ा करके कभी त्याग नहीं होता। देख, मैं अब चला!

“घर का कोई प्रबन्ध न करके, उसी अवस्था में कन्धे पर अँगोछा डाले हुए, घर छोड़कर वह चला गया। इसे ही तीव्र वैराग्य कहते हैं।

“एक तरह का वैराग्य और है, उसे मर्कट-वैराग्य कहते हैं। संसार की ज्वाला से जलकर गेरुआ वस्त्र पहनकर काशी चला गया। बहुत दिनों तक कोई खबर नहीं। फिर एक चिट्ठी आयी – 'तुम लोग कोई चिन्ता न करो, यहाँ मुझे एक काम मिल गया है।'

“संसार की ज्वाला तो है ही। बीबी कहना नहीं मानती, वेतन सिर्फ बीस रुपया महीना, बच्चे का 'अन्नप्राशन' नहीं हो रहा है, बच्चे को पढ़ाने का खर्च नहीं, घर टूटा हुआ, छत चू रही है, मरम्मत के लिए रुपये नहीं!

“इसीलिए जब कोई कम उम्र का लड़का आता है तब मैं उससे पूछ लेता हूँ कि तुम्हारे कौन कौन हैं।

(महिमा के प्रति) “तुम्हारे लिए संसार-त्याग करने की क्या जरूरत है? साधुओं को कितनी तकलीफ होती है! एक की स्त्री ने पूछा, 'तुम संसार छोड़ोगे – क्यों? दस घरों में घूमघूमकर भीख माँगोगे, इससे तो एक घर में खाते हो, यही अच्छा है।'

“सदाव्रत की तलाश में रास्ता छोड़कर साधु-सन्त तीन कोस से भी दूर चले जाते हैं। मैंने देखा है, जगन्नाथ के दर्शन करके सीधे रास्ते से साधु आ रहे हैं, परन्तु सदाव्रत के लिए उन्हें सीधा रास्ता छोड़कर जाना पड़ता है।

“यह तो अच्छा है – किले से लड़ना। मैदान में खड़े होकर लड़ने में असुविधाएँ हैं। विपत्ति, देह पर गोले और गोलियाँ आकर गिरती है।

“हाँ कुछ दिनों के लिए निर्जन में जाकर, ज्ञान-लाभ करके संसार में आकर रहो। जनक ज्ञान-लाभ करके संसार में आकर रहे थे। ज्ञान-लाभ हो जाने पर फिर जहाँ रहो, उसमें कोई हानि नहीं।”

महिमाचरण – महाराज, मनुष्य विषय में क्यों फँस जाता है?

श्रीरामकृष्ण – उन्हें बिना प्राप्त किये ही विषय में रहता है, इसलिए। उन्हें प्राप्त कर लेने पर फिर मुग्ध नहीं होता। पतिंगा अगर एक बार उजाला देख लेता है, तो फिर और उसे अन्धकार अच्छा नहीं लगता।

“उन्हें पाने की इच्छा रखनेवालों को वीर्य-धारण करना पड़ता है।

“शुकदेवादि ऊर्ध्वरेता थे। इनका रेतपात कभी नहीं हुआ।

“एक और है धैर्येरता। पहले रेतपात हो चुका है,– परन्तु इसके बाद से वे वीर्यधारण करने लगे हैं। बारह वर्ष तक धैर्येरता रहने पर विशेष शक्ति पैदा होती है।