श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
Public domain in India · Report a copyright issue
DevanagariHindipublished711 pages
Page 487 of 711
Read in contextPage 487
४६४ श्रीरामकृष्णवचनामृत ९ मार्च, १८८४
“वे नरलीला करने के लिए मनुष्य-रूप में अवतीर्ण होते हैं – जैसे श्रीरामचन्द्र, श्रीकृष्ण, श्रीचैतन्यदेव। अवतार का चिन्तन करने से ही उनका चिन्तन होता है।”
ब्राह्मभक्त भगवानदास आये हैं।
श्रीरामकृष्ण – (भगवानदास के प्रति) – ऋषियों का धर्म, सनातन धर्म – अनन्त काल से है और रहेगा। इस सनातन धर्म के भीतर निराकार, साकार सभी प्रकार की पूजाएँ हैं। ज्ञानपथ, भक्तिपथ सभी हैं। अन्य जो सम्प्रदाय हैं, वे आधुनिक हैं। कुछ दिन रहेंगे, फिर मिट जायँगे।
$\square$ $\square$ $\square$