श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context४४६ श्रीरामकृष्णवचनामृत २४ फरवरी, १८८४
इसलिए कि किसी के नाम का असर तो इन डाकुओं पर पड़ेगा ही!
(मास्टर से) “अच्छा, मुझमें इतनी अधीरता क्यों है?”
मास्टर – आप सदा ही समाधिस्थ हैं। भक्तों के लिए सिर्फ थोड़ासा मन शरीर पर रखा है। इसीलिए शरीर-रक्षा के निमित्त कभी कभी अधीर होते हैं।
श्रीरामकृष्ण – हाँ; थोड़ा-सा मन शरीर पर है। भक्ति और भक्तों को लेकर रहने के लिए।
मणिलाल मल्लिक प्रदर्शनी की बात कह रहे हैं।
यशोदा कृष्ण को गोद में लिये हैं – बड़ी सुन्दर मूर्ति है, यह सुनकर श्रीरामकृष्ण की आँखों में आँसू आ गये! उस वात्सल्यरस की प्रतिमा यशोदा की बात सुनकर श्रीरामकृष्ण की उद्दीपना होने लगी, रो रहे हैं।
मणिलाल – आपका जी अच्छा नहीं, नहीं तो आप भी एक बार जाकर देख आते – किले के मैदान की प्रदर्शनी।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर आदि से) – मैं जाऊँ तो भी सब कुछ मुझे देखने को न मिलेगा। कोई एक चीज देखने ही से बेहोश हो जाऊँगा – और चीजें फिर देखने को रह जायेंगी। चिड़ियाखाना दिखाने के लिए ले गये थे। सिंह देखकर ही समाधि हो गयी। ईश्वरी भगवती के वाहन को देखकर ईश्वरी उद्दीपना हुई। तब फिर दूसरे जानवरों को कौन देखता है, सिंह देखकर ही लौट आया। इसलिए यदु मल्लिक की माँ ने एक बार कहा था, इनको प्रदर्शनी ले चलो, – फिर उसने कहा, नहीं रहने दो।
मणि मल्लिक पुराने ब्राह्मसमाजी हैं। उम्र पैंसठ की होगी। श्रीरामकृष्ण उन्हींके भावों में बातचीत करते हुए, उपदेश दे रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – जयनारायण पण्डित बड़ा उदार था। जाकर मैंने देखा, उसका भाव बड़ा अच्छा है। लड़के बूट पहने हुए थे। उसने खुद कहा, मैं काशी जाऊँगा। जो कुछ कहा, अन्त में वही किया। काशी में रहा और उसकी देह भी वहीं छूटी।
“उम्र होने पर इस तरह चले जाकर ईश्वर-चिन्तन करना अच्छा है, क्यों?”
मणिलाल – जी हाँ। संसार की अड़चनों से जी ऊब जाता है।
श्रीरामकृष्ण – गौरी फूलदल देकर अपनी स्त्री की पूजा करता था। सभी स्त्रियाँ भगवती की एक एक मूर्ति हैं।
(मणिलाल से) “अपनी वह बात जरा इन लोगों से भी तो कहो।”
मणिलाल – (सहास्य) – नाव पर चढ़कर कुछ लोग गंगा पार कर रहे थे। उनमें एक पण्डित अपनी विद्या का खूब परिचय दे रहा था। ‘मैंने अनेक शास्त्र पढ़े हैं – वेद – वेदान्त – षड्दर्शन।’ एक से उसने पूछा, ‘वेदान्त क्या है, जानते हो?’ उसने कहा, ‘जी नहीं’। ‘फिर तुम सांख्य-पतञ्जलि जानते हो?’ उसने कहा – ‘जी नहीं’। ‘दर्शन आदि कुछ