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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 462 of 711

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Page 462
२ फरवरी १८८४परिच्छेद ७५४३९

बाँधेंगे। श्रीरामकृष्ण बालक की तरह हँस रहे हैं और कहते हैं, ऐहिक और पारत्रिक के मधूसूदन!

मधु – (सहास्य) – केवल नाम का बोझ ढो रहा हूँ।

श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – कोई नाम कम थोड़े ही है? उनमें और उनके नाम में कोई भेद नहीं है। सत्यभामा जब तुला पर स्वर्ण, मणि और मुक्ताएँ रखकर श्रीकृष्ण को तौल रही थीं तब वजन पूरा न हुआ। जब रुक्मिणी ने तुलसी पर कृष्ण-नाम लिखकर एक ओर रख दिया तब वजन पूरा उतरा।

अब डाक्टर पटरियाँ बाँधेंगे, जमीन पर बिस्तरा लगाया गया, श्रीरामकृष्ण हँसते हुए बिस्तरे पर आकर लेटे गाने के ढंग से कह रहे हैं – “'राधिका की यह दशम दशा है। वृन्दा कहती है, अभी न जाने क्या क्या होगा!'”

चारों ओर भक्तगण बैठे हैं। श्रीरामकृष्ण फिर गा रहे हैं – 'सब सखि मिलि बैठल सरोवर-कूले।' श्रीरामकृष्ण भी हँस रहे हैं और भक्तगण भी हँस रहे हैं। बैंडेज बाँधना समाप्त हो जाने पर श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं –

“कलकत्ते के डाक्टरों पर मेरा उतना विश्वास नहीं होता। शम्भू को विकार की अवस्था थी, डाक्टर (सर्वाधिकार) कहता था, यह कुछ नहीं है; दवा की नशा है! उसके बाद ही शम्भू की देह छूट गयी।”

(४)

मुख्य बात – अहैतुकी भक्ति। अपने स्वरूप को जानो।

सन्ध्या के पश्चात् श्रीमन्दिर में आरती हो गयी। कुछ देर बाद कलकत्ते से अधर आये। भूमिष्ठ हो उन्होंने श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया। कमरे में महिमाचरण, राखाल और मास्टर हैं। हाजरा महाशय भी बीच-बीच में आते हैं।

अधर – आप कैसे हैं?

श्रीरामकृष्ण – (स्नेह-भरे शब्दों में) – यह देखो, हाथ में लगकर क्या हुआ है। (सहास्य) हैं और कैसे!

अधर जमीन पर भक्तों के साथ बैठे हैं। श्रीरामकृष्ण उनसे कह रहे हैं – “तुम एक बार इस पर हाथ तो फेर दो।”

अधर छोटी खाट की उत्तर ओर बैठकर श्रीरामकृष्ण की चरण-सेवा कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण फिर महिमाचरण से बातचीत कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – (महिमा के प्रति) – अहैतुकी भक्ति – तुम इसे अगर साध्य कर सको तो अच्छा हो।

“ 'मुक्ति, मान, रुपया, रोग अच्छा होना, कुछ नहीं चाहता, – मैं बस तुम्हें ही