श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context४१८ श्रीरामकृष्णवचनामृत २७ दिसम्बर, १८८३
“बच्चा अगर बाप का हाथ पकड़कर चलता हो, तो वह गड्ढे में गिर सकता है, परन्तु अगर बाप बच्चे का हाथ पकड़े हुए हो तो बच्चा कभी नहीं गिर सकता।
“सुनो, मैंने माँ से शुद्धा-भक्ति की प्रार्थना की थी। माँ से कहा था, 'यह लो अपना धर्म, यह लो अपना अधर्म; मुझे शुद्धा-भक्ति दो। यह लो अपनी शुचि, यह लो अपनी अशुचि, मुझे शुद्धा-भक्ति दो। माँ, यह लो अपना पाप यह लो अपना पुण्य, मुझे शुद्धा-भक्ति दो।'”
गोस्वामी – जी हाँ।
श्रीरामकृष्ण – सब भक्तों को नमस्कार करना। परन्तु 'निष्ठाभक्ति' भी है। सब को प्रणाम तो करना, परन्तु हृदय का उमड़ता हुआ प्यार एक ही पर हो। इसी का नाम निष्ठा है।
“राम-रूप के सिवाय और कोई रूप हनुमान को न भाता था। गोपियों की इतनी निष्ठा थी कि उन्होंने द्वारका में पगड़ीवाले श्रीकृष्ण को देखना ही न चाहा।
“स्त्री अपने देवर-जेठ आदि को पैर धोने के लिए पानी और बैठने को आसन आदि देकर सेवा करती है; परन्तु पति की जैसी सेवा करती है, वैसी वह किसी दूसरे की नहीं करती। पति के साथ उसका सम्बन्ध कुछ दूसरा है।”
रामचन्द्र ने कुछ मिठाइयाँ देकर श्रीरामकृष्ण की पूजा की।
अब वे दक्षिणेश्वर जानेवाले हैं। मणि से उन्होंने बनात लेकर शरीर ढक लिया और टोपी पहन ली। अब भक्तों के साथ वे गाड़ी पर चढ़ने लगे। रामचन्द्र आदि भक्त उन्हें चढ़ा रहे हैं, मणि भी गाड़ी पर बैठे, वे भी दक्षिणेश्वर लौट जाएँगे।
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