श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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४१२ श्रीरामकृष्णवचनामृत २७ दिसम्बर, १८८३
खड़ी हुई। मणि ईशान का घर जानते थे। चौराहे पर गाड़ी फिराकर ईशान के घर के सामने खड़ी करने के लिए कहा।
ईशान आत्मीयों के साथ आदरपूर्वक सहास्यमुख श्रीरामकृष्ण की अभ्यर्थना कर उन्हें नीचेवाले बैठकखाने में ले गए। श्रीरामकृष्ण ने भक्तों के साथ आसन ग्रहण किया।
कुशल-प्रश्न हो जाने के बाद श्रीरामकृष्ण ईशान के पुत्र श्रीश के साथ बातचीत करने लगे। श्रीश एम. ए., बी. एल. पास करके अलीपुर में वकालत कर रहे हैं। एण्ट्रेंस और एफ. ए. की परीक्षाओं में विश्वविद्यालय में उनका प्रथम स्थान आया था। इस समय उनकी आयु लगभग तीस वर्ष की होगी। जैसा पाण्डित्य है, वैसा ही विनय भी है। लोग उन्हें देखकर यह समझ लेते हैं कि ये कुछ नहीं जानते। हाथ जोड़कर श्रीश ने श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया। मणि ने श्रीरामकृष्ण को उनका परिचय दिया और कहा, "ऐसी शान्त प्रकृति का मनुष्य दीख नहीं पड़ता।"
श्रीरामकृष्ण (श्रीश के प्रति) – क्यों जी, तुम क्या करते हो?
श्रीश – जी, मैं अलीपुर जा रहा हूँ, वकालत करता हूँ।
श्रीरामकृष्ण (मणि से) – ऐसा आदमी और वकालत!
(श्रीश से) – "अच्छा, तुम्हें कुछ पूछना है? - संसार में अनासक्त होकर रहना, क्यों?"
श्रीश – परन्तु कार्य के निर्वाह के लिए संसार में कितने ही अनुचित काम करने पड़ते हैं। कोई पापकर्म कर रहा है, कोई पुण्यकर्म। यह सब क्या पहले के कर्मों का फल है? क्या यह करते ही रहना होगा?
श्रीरामकृष्ण – कर्म कब तक हैं? – जब तक उन्हें प्राप्त न कर सको। उन्हें प्राप्त कर लेने पर सब चले जाते हैं। तब पापपुण्य के पार जाया जाता है।
"फल आ जाने पर फूल चला जाता है। फूल दीख पड़ता है फल होने के लिए।
"सन्ध्यादि कर्म कितने दिन के लिए? – जितने दिन तक ईश्वर का नामस्मरण करते हुए रोमांच न हो आए, आँखों में आँसू न आ जाएँ। ये सब अवस्थाएँ ईश्वर-प्राप्ति के लक्षण है, ईश्वर पर शुद्धा-भक्ति प्राप्त करने के लक्षण हैं।
"उन्हें जान लेने पर मनुष्य पाप और पुण्य दोनों के परे चला जाता है। रामप्रसाद ने कहा है, भुक्ति और मुक्ति को मैं मस्तक पर धारण करता हूँ; और काली ब्रह्म है, यह मर्म जानकर धर्माधर्म को मैंने छोड़ ही दिया है।
"उनकी ओर जितना बढ़ोगे, उतना ही वे कर्म घटा देंगे। गृहस्थ की बहू गर्भवती होने पर उसकी सास धीरे धीरे उसका काम घटा देती है। जब दसवाँ महीना होता है, तब बिलकुल काम घटा दिया जाता है। बच्चा हो जाने पर वह उसी को लेकर व्यस्त रहती है, उसी को लेकर आनन्द करती है।"
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