Skip to content
SarvaKosh
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished711 pages

Page 352 of 711

Read in context
Page 352
१६ अक्टूबर, १८८३परिच्छेद ५७३२९

“उस एक से ही अनेक हुए हैं – नित्य से ही लीला है। एक ऐसी अवस्था है जिसमें 'अनेक' का बोध नहीं रहता और न 'एक' का ही; क्योंकि 'एक' के रहते ही 'अनेक' आ जाता है। वे तो उपमाओं से रहित हैं – उन्हें उपमा देकर समझाने का उपाय नहीं है! अन्धकार और प्रकाश के मध्य में हैं। हम जिस प्रकाश को देखते हैं, ब्रह्म वह प्रकाश नहीं है – ब्रह्म यह जड़ आलोक नहीं है।*

“फिर जब वे मेरे मन की अवस्था को बदल देते हैं – जिस समय लीला में मन को उतार लाते हैं – तब देखता हूँ ईश्वर, माया, जीव, जगत् – वे सब कुछ बने हुए हैं।

ईश्वर ही कर्ता

“फिर कभी वे दिखाते हैं कि उन्होंने इस सब जीव-जगत् को बनाया है – जैसे मालिक और उसका बगीचा।

“वे कर्ता हैं और उन्हीं का यह सब जीव-जगत् है, इसी का नाम है ज्ञान। और 'मैं करनेवाला हूँ', 'मैं गुरु हूँ', 'मैं पिता हूँ', इसी का नाम है अज्ञान। फिर मेरे हैं ये सब घर-द्वार, परिवार, धन, जन आदि – इसी का नाम है अज्ञान।”

बलराम के पिता – जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण – जब तक यह बुद्धि नहीं होती कि 'ईश्वर, तुम्हीं कर्ता हो' तब तक बारम्बार लौटकर आना ही होगा, बारम्बार जन्म लेना पड़ेगा। फिर जब यह ज्ञान हो जाएगा कि तुम्हीं कर्ता हो, तब जन्म नहीं होगा।

“जब तक 'तू ही, तू ही' न करोगे तब तक छुटकारा नहीं। आना-जाना, पुनर्जन्म होगा ही – मुक्ति न होगी। और 'मेरा मेरा' कहने से भी क्या होगा? बाबू का मुनीम कहता है, 'यह हमारा बगीचा है, हमारी खाट, हमारी कुर्सी है।' परन्तु बाबू जब उसे नौकरी से निकाल देते हैं तो अपनी आम की लकड़ी की छोटीसी सन्दूकची तक ले जाने का उसे अधिकार नहीं रहता।

“'मैं और मेरा' ने सत्य को छिपा रखा है – जानने नहीं देता!

अद्वैतज्ञान तथा चैतन्यदर्शन

“अद्वैत का ज्ञान हुए बिना चैतन्य का दर्शन नहीं होता। चैतन्य का दर्शन होने पर तब नित्यानन्द होता है। परमहंसस्थिति में यही नित्यानन्द है।

“वेदान्तमत में अवतार नहीं है। इस मत में चैतन्यदेव अद्वैत के एक बुलबुला हैं।

“चैतन्य का दर्शन कैसा? दियासलाई जलाने से अँधेरे कमरे में जिस प्रकार एकाएक रोशनी हो जाती है।


* ब्रह्म यह जड़ आलोक नहीं है – “तत् ज्योतिषां ज्योतिः।” “तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यत् आत्मविदो विदुः।” – मुण्डक उपनिषद्, २।२।९