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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 350 of 711

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Page 350

१० अक्टूबर, १८८३ | परिच्छेद ५६ | ३२७

श्रीरामकृष्ण बलराम के पिता को उस प्रकार के संकीर्ण भाव को त्यागने का उपदेश कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण (बलराम के पिता आदि के प्रति) – जो भी धर्म हों, जो भी मत हो, सभी उसी एक ईश्वर को पुकार रहे हैं। इसलिए किसी धर्म अथवा मत के प्रति अश्रद्धा या घृणा नहीं करनी चाहिए। वेद उन्हें ही कह रहे हैं, सच्चिदानन्द ब्रह्म, भागवत आदि पुराण उन्हें ही कह रहे हैं, सच्चिदानन्द कृष्ण, और तन्त्र कह रहे हैं, सच्चिदानन्द शिव। वही एक सच्चिदानन्द हैं।

“वैष्णवों के अनेक सम्प्रदाय हैं। वेद जिन्हें ब्रह्म कहते हैं, वैष्णवों का एक दल उन्हें अलख-निरंजन कहता है। अलख अर्थात् जिन्हें लक्ष्य नहीं किया जा सकता, इन्द्रियों द्वारा देखा नहीं जा सकता। वे कहते हैं, राधा व कृष्ण अलख के दो बुलबुले हैं।

“वेदान्तमत में अवतार नहीं है। वेदान्तवादी कहते हैं, राम, कृष्ण – ये सच्चिदानन्दरूपी समुद्र की दो लहरें हैं।

“एक के अतिरिक्त दो तो नहीं हैं, चाहे जिस नाम से कोई ईश्वर को पुकारे, यदि वह पुकार हार्दिक हो तो वह उसके पास अवश्य ही पहुँचेगी। व्याकुलता रहनी चाहिए।”

श्रीरामकृष्ण भाव में विभोर होकर भक्तों से ये सब बातें कह रहे हैं। अब प्रकृतिस्थ हुए हैं और कह रहे हैं, “तुम बलराम के पिता हो?”

सभी थोड़ी देर चुपचाप बैठे हैं, बलराम के वृद्ध पिता चुपचाप हरिनाम की माला जप रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण (मास्टर आदि के प्रति) – अच्छा, ये लोग इतना जप करते हैं, इतना तीर्थ करते हैं, फिर भी इनकी प्रगति क्यों नहीं होती? मानो अठारह मास का इनका एक वर्ष होता है।

“हरीश से कहा, ‘यदि व्याकुलता न रहे, तो फिर वाराणसी जाने की क्या आवश्यकता? व्याकुलता रहने पर यहीं पर वाराणसी है।’”

“इतना तीर्थ, इतना जप करते हैं, फिर भी कुछ क्यों नहीं होता? व्याकुलता नहीं है। व्याकुल होकर उन्हें पुकारने पर वे दर्शन देते हैं।”

“नाटक के प्रारम्भ में रंगभूमि पर बड़ी गड़बड़ी मची रहती है। उस समय श्रीकृष्ण का दर्शन नहीं होता। उसके बाद नारद ऋषि जिस समय व्याकुल होकर वृन्दावन में आकर वीणा बजाते हुए पुकारते हैं और कहते हैं, ‘प्राण हे, गोविन्द मम जीवन’ – उस समय कृष्ण और ठहर नहीं सकते, गोपालों के साथ सामने आ जाते हैं।”


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