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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

DevanagariHindipublished711 pages

Page 315 of 711

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Page 315
२९२श्रीरामकृष्णवचनामृत७ सितम्बर, १८८३

“एक दूसरे दिन दिखाया कि विष्ठा-मूत्र, अन्न-व्यंजन, तरह तरह की खाने की चीजें पड़ी हुई हैं। एकाएक भीतर से जीवात्मा ने निकलकर आग की लौ की तरह सब चीजों को चखा, – मानो जीभ हिलाते हुए सभी चीजों का एक बार स्वाद ले लिया, विष्ठा, मूत्र, सब कुछ चखा। इससे (ईश्वर ने) दिखा दिया कि सब एक है– अभेद हैं।

“फिर एक बार दिखाया कि यहाँ के* अनेक भक्त हैं – पार्षद – अपने जन। ज्योंही आरती का शंख और घण्टा बज उठता, मैं कोठी की छत पर चढ़कर व्याकुल हो चिल्लाकर कहता, ‘अरे, तुम लोग कौन कहाँ हो? आओ, तुम्हें देखने के लिए मेरे प्राण छटपटा रहे हैं।’

“अच्छा, मेरे इन दर्शनों के बारे में तुम्हें क्या मालूम होता है?”

मणि – आप ईश्वर के विलास का स्थान हैं। मैंने यही समझा है कि आप यन्त्र हैं और वे यन्त्री (चलानेवाले) हैं। दूसरों को उन्होंने मानो साँचे में डालकर तैयार किया है, परन्तु आपको स्वयं के हाथों से गढ़ा है।

श्रीरामकृष्ण – अच्छा, हाजरा कहता है कि ईश्वर के दर्शन के बाद षडैश्वर्य मिलते हैं।

मणि – जो शुद्धा भक्ति चाहते हैं वे ईश्वर के ऐश्वर्य की इच्छा नहीं करते।

श्रीरामकृष्ण – शायद हाजरा पूर्वजन्म में गरीब था, इसीलिए उसे ऐश्वर्य देखने की उतनी तीव्र इच्छा है। हाल में हाजरा ने कहा है – ‘क्या मैं रसोइया ब्राह्मणों से बातचीत करता हूँ!’ फिर कहता है – ‘मै खजांची से कहकर तुम्हें वे सब चीजें दिला दूँगा!’

(मणि का उच्च हास्य)

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – वह ये सब बातें कहता रहता है और मैं चुप रह जाता हूँ।

मणि – आप तो बहुत बार कह चुके हैं कि शुद्ध भक्त ऐश्वर्य देखना नहीं चाहता। वह ईश्वर को गोपाल रूप में देखना चाहता है। पहले ईश्वर चुम्बक-पत्थर और ईश्वर भक्त सुई होते हैं; फिर तो भक्त ही चुम्बक-पत्थर और ईश्वर सुई बन जाते हैं – अर्थात् भक्त के पास ईश्वर छोटे हो जाते हैं।

श्रीरामकृष्ण – जैसे ठीक उदय के समय का सूर्य। अनायास ही देखा जा सकता है, वह आँखों को झुलसाता नहीं, बल्कि उनको तृप्त कर देता है। भक्त के लिए भगवान् का भाव कोमल हो जाता है – वे अपना ऐश्वर्य छोड़ भक्तों के पास आ जाते हैं।


* गुरुभाव से श्रीरामकृष्ण अपने लिए ‘मैं’ या ‘हम’ शब्द का प्रयोग साधारण दशा में कदाचित् करते थे। किसी और ढंग से वह भाव वे सूचित करते थे। जैसे – ‘मेरे पास’ न कहकर ‘यहाँ’ कहते थे। ‘मेरा’ न कहकर ‘यहाँ का’ अथवा अपना शरीर दिखाकर ‘इसका’ कहते थे। हाँ, जगन्माता के सन्तान-भाव से वे ‘मैं’ या ‘हम’ शब्द का व्यवहार करते थे। भावावस्था में गुरुभाव के अर्थ में भी इन शब्दों का प्रयोग वे करते थे।