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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

DevanagariHindipublished711 pages

Page 310 of 711

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Page 310

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परिच्छेद ५०

दक्षिणेश्वर मन्दिर में भक्तों के साथ

मणिमोहन को शिक्षा, ब्रह्मज्ञान के लक्षण। ध्यानयोग

श्रीरामकृष्ण अपनी छोटी खाट पर बैठे मसहरी के भीतर ध्यान कर रहे हैं। रात के सात-आठ बजे होंगे। मास्टर और उनके एक मित्र हरिबाबू जमीन पर बैठे हैं। आज सोमवार, तारीख २० अगस्त १८८३ ई. है।

आजकल हाजरा महाशय यहाँ रहते हैं। राखाल भी प्रायः रहा करते हैं - और कभी कभी अधर के यहाँ रहते हैं। नरेन्द्र, भवनाथ, अधर, बलराम, राम, मनोमोहन, मास्टर आदि प्रायः प्रति सप्ताह आया करते हैं।

हृदय ने श्रीरामकृष्ण की बड़ी सेवा की थी। वे घर पर बीमार हैं, यह सुनकर श्रीरामकृष्ण बहुत चिन्तित हुए हैं। इसीलिए एक भक्त ने राम चटर्जी के हाथ आज दस रुपये भेजे हैं - हृदय को भेजने के लिए। देने के समय श्रीरामकृष्ण वहाँ उपस्थित नहीं थे। वही भक्त एक लोटा भी लाए हैं। श्रीरामकृष्ण ने उनसे कहा था, “यहाँ के लिए एक लोटा लाना; भक्त लोग पानी पीएँगे।”

मास्टर के मित्र हरिबाबू को लगभग ग्यारह वर्ष हुए, पत्नीवियोग हुआ है। फिर उन्होंने विवाह नहीं किया। उनके मातापिता, भाई-बहन, सभी हैं। उन पर उनका बड़ा स्नेह हैं, और उनकी सेवा वे करते हैं। उनकी आयु अट्ठाईस-उनतीस वर्ष होगी। भक्तों के आते ही श्रीरामकृष्ण मसहरी से बाहर आए। मास्टर आदि ने उनको भूमिष्ठ हो प्रणाम किया। मसहरी उठा दी गयी। आप छोटे तख्त पर बैठकर बातें करने लगे।

श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) – मसहरी के भीतर ध्यान कर रहा था। फिर सोचा कि यह तो केवल एक रूप की कल्पना ही है। इसीलिए फिर अच्छा न लगा। अच्छा होता यदि ईश्वर बिजली की चमक की तरह अपने आपको झट से प्रकट करते। फिर मैंने सोचा, कौन ध्यान करनेवाला है, और ध्यान करूँ ही किसका?

मास्टर – जी हाँ। आपने कह दिया है कि ईश्वर ही जीव और जगत् आदि सब कुछ हुए हैं। जो ध्यान कर रहा है वह भी तो ईश्वर ही है।

श्रीरामकृष्ण – फिर बिना ईश्वर के कराए तो कुछ होनेवाला नहीं। वे अगर ध्यान

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar