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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

DevanagariHindipublished711 pages

Page 302 of 711

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Page 302

परिच्छेद ४९

दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ

(१)

वेदान्तवादियों का मत। माया अथवा दया?

आज रविवार का दिन है। श्रावण कृष्णा प्रतिपदा, १९ अगस्त १८८३ ई.। अभी कुछ ही देर पहले देवी का भोग लगा और आरती हुई। अब मन्दिर बन्द हो गया है। श्रीरामकृष्ण देवी का प्रसाद पाने के बाद कुछ आराम कर रहे थे। विश्राम के बाद – अभी दोपहर का समय ही है – वे अपने कमरे में तख्त पर बैठे हुए हैं। इसी समय मास्टर ने आकर उन्हें प्रणाम किया। थोड़ी देर बाद उनके साथ वेदान्त-सम्बन्धी चर्चा होने लगी।

श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) – देखो, ‘अष्टावक्र-संहिता’ में आत्मज्ञान की बातें हैं। आत्मज्ञानी कहते हैं, ‘सोऽहम्’ अर्थात् मैं ही वह परमात्मा हूँ। यह वेदान्तवादी संन्यासियों का मत है। सांसारिक व्यक्तियों के लिए यह मत ठीक नहीं है। सब कुछ किया जा रहा है, फिर भी ‘मैं ही वह निष्क्रिय परमात्मा हूँ’ यह कैसे हो सकता है? वेदान्तवादी कहते हैं कि आत्मा निर्लिप्त है। सुख-दुःख, पाप-पुण्य – ये सब आत्मा का कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते; परन्तु देहाभिमानी व्यक्तियों को कष्ट दे सकते हैं। धुआँ दीवार को मैला करता है, पर आकाश का कुछ नहीं कर सकता। कृष्णकिशोर ज्ञानियों की तरह कहा करता था कि मैं ‘ख’ अर्थात् आकाशवत् हूँ। वह परम भक्त था; उसके मुँह में यह बात भले ही शोभा दे, पर सब के मुँह में यह शोभा नहीं देती।

“पर ‘मैं मुक्त हूँ’ यह अभिमान बड़ा अच्छा है। ‘मैं मुक्त हूँ’ कहते रहने से कहनेवाला मुक्त हो जाता है। और ‘मैं बद्ध हूँ’ कहते रहने से कहनेवाला बद्ध ही रह जाता है। जो केवल यह कहता है कि ‘मैं पापी हूँ’ वही सचमुच गिरता है। कहते यही रहना चाहिए – ‘मैंने उनका नाम लिया है, अब मेरे पाप कहाँ? मेरा बन्धन कैसा?’


* हृदय श्रीरामकृष्णदेव के भानजे थे और १८८१ ई. तक कालीमन्दिर में रहकर लगभग २३ वर्ष तक इनकी सेवा की थी। उनका जन्मस्थान हुगली जिले के अन्तर्गत सिहोड़ ग्राम में था। श्रीरामकृष्ण का जन्मस्थान कामारपुकुर, यहाँ से दो कोस दूर है। ६२ वर्ष की अवस्था में हृदय का देहावसान हुआ।