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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

DevanagariHindipublished711 pages

Page 286 of 711

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Page 286
२१ जुलाई, १८८३परिच्छेद ४६२६३

रामलाल जिस समय गा रहे थे – 'इसके ऊपर कण्ठस्थित विशुद्धचक्र में धूम्रवर्ण षोडशदल कमल है। इस कमल के मध्यभाग में जो आकाश है वह यदि अवरुद्ध हो जाय तो सर्वत्र आकाश ही रह जाता है' – उस समय श्रीरामकृष्ण ने मास्टर से कहा –

"यह सुनो, इसी का नाम है निराकार सच्चिदानन्द-दर्शन। विशुद्धचक्र का भेदन होने पर 'सर्वत्र आकाश ही रह जाता है'।"

मास्टर – जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण – इस मायामय जीव-जगत् के पार हो जाने पर तब कहीं नित्य स्वरूप में पहुँचा जा सकता है। नादभेद होने पर ही समाधि लगती है। ओंकार-साधना करते करते नादभेद होता है और समाधि लगती है।

अधर ने फलमिष्टान्न आदि के द्वारा श्रीरामकृष्ण की सेवा की। श्रीरामकृष्ण ने कहा, “आज यदु मल्लिक के यहाँ जाना पड़ेगा।”

(३)

यदु मल्लिक के मकान पर

श्रीरामकृष्ण यदु मल्लिक के मकान पर आए। कृष्णा प्रतिपदा है। चाँदनी रात है।

जिस कमरे में सिंहवाहिनी देवी की नित्यसेवा होती है उस कमरे में श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ उपस्थित हुए। सचन्दन पुष्पों और मालाओं द्वारा पूजित और विभूषित होकर देवी ने अपूर्व शोभा धारण की है। सामने पुजारी बैठे हुए हैं। प्रतिमा के सम्मुख दीप जल रहा है। सहचरों में से एक को श्रीरामकृष्ण ने रुपया चढ़ाकर प्रणाम करने कहा, क्योंकि देवता के दर्शन के लिए आने पर कुछ प्रणामी चढ़ानी चाहिए।

श्रीरामकृष्ण सिंहवाहिनी के सामने हाथ जोड़कर खड़े हैं। आपके पीछे भक्तगण हाथ जोड़कर खड़े हैं। श्रीरामकृष्ण बड़ी देर तक दर्शन कर रहे हैं।

क्या आश्चर्य है! दर्शन करते हुए आप सहसा समाधिमग्न हो गए! पत्थर की मूर्ति की तरह निःस्तब्ध खड़े हैं! नेत्र निष्पलक हैं।

काफी समय के बाद आपने लम्बी साँस छोड़ी। समाधि छूटी। नशे में मस्त हुए-से कह रहे हैं – “माँ चलता हूँ!” परन्तु चल नहीं पाते – उसी प्रकार खड़े हैं।

फिर रामलाल से कहा, “तुम वह गाना गाओ – तभी मैं ठीक होऊँगा।”

रामलाल गाने लगे – “हे माँ हरमोहिनी, तूने संसार को भुलावे में डाल रखा है।”

गीत समाप्त हुआ। अब श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ बैठकखाने की ओर आ रहे हैं। चलते हुए बीच बीच में कहते हैं – “माँ, मेरे हृदय में रहो, माँ।”

यदु मल्लिक अपने लोगों के साथ बैठकखाने में बैठे हैं। श्रीरामकृष्ण भावावस्था में ही हैं। आकर गा रहे हैं –