श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in contextजून, १८८३
परिच्छेद ४४
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का पुतला समुद्र नापने जाकर फिर खबर नहीं देता। गलकर उसी में मिल जाता है।”
सन्ध्या हुई, मन्दिरों में आरती हो रही है। श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में छोटे तख्त पर बैठकर जगज्जननी का चिन्तन कर रहे हैं। राखाल, लाटू, रामलाल, किशोरी गुप्त आदि भक्तगण उपस्थित हैं। मास्टर आज रात को ठहरेंगे। कमरे के उत्तर की ओर एक छोटे बरामदे में श्रीरामकृष्ण एक भक्त के साथ एकान्त में बातें कर रहे हैं। कह रहे हैं, “भोर में तथा उत्तर-रात्रि में ध्यान करना अच्छा है और प्रतिदिन सन्ध्या के बाद।” किस प्रकार ध्यान करना चाहिए, साकार ध्यान, अरूप ध्यान, यह सब बता रहे हैं।
थोड़ी देर बाद श्रीरामकृष्ण पश्चिम के गोल बरामदे में बैठ गए। रात के नौ बजे का समय होगा। मास्टर पास बैठे हैं, राखाल आदि बीच बीच में कमरे के भीतर आ-जा रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण (मास्टर के प्रति) – देखो, यहाँ पर जो लोग आएँगे, उन सभी का सन्देह मिट जाएगा; क्या कहते हो?
मास्टर – जी हाँ।
उसी समय गंगा में काफी दूरी पर माँझी अपनी नाव खेता हुआ गाना गा रहा था। गीत की वह ध्वनि मधुर अनाहत ध्वनि की तरह अनन्त आकाश के बीच में से होकर मानो गंगा के विशाल वक्ष को स्पर्श करती हुई श्रीरामकृष्ण के कानों में प्रविष्ट हुई। श्रीरामकृष्ण उसी समय भावाविष्ट हो गए! सारे शरीर के रोंगटे खड़े हो उठे। श्रीरामकृष्ण मास्टर का हाथ पकड़कर कह रहे हैं, “देखो, देखो, मुझे रोमांच हो रहा है। मेरे शरीर पर हाथ रखकर देखो।” प्रेम से आविष्ट उनके उस रोमांचपूर्ण शरीर को छूकर वे विस्मित हो गये। 'पुलकपूरित अंग!' उपनिषद् में कहा गया है कि वे विश्व में आकाश में 'ओतप्रोत' होकर विद्यमान हैं। क्या वे ही शब्द के रूप में श्रीरामकृष्ण को स्पर्श कर रहे हैं? क्या यही शब्दब्रह्म है?*
थोड़ी देर बाद श्रीरामकृष्ण फिर वार्तालाप कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – जो लोग यहाँ पर आते हैं, उनके शुभ संस्कार हैं; क्या कहते हो?
मास्टर – जी, हाँ।
श्रीरामकृष्ण – अधर के वैसे संस्कार थे।
मास्टर – इसमें क्या कहना है!
श्रीरामकृष्ण – सरल होने पर ईश्वर शीघ्र प्राप्त होते हैं। फिर दो पथ हैं, – सत् और असत्, सत् पथ से जाना चाहिए।
मास्टर – जी हाँ, धागे में यदि रेशा निकला हो तो वह सुई के भीतर नहीं जा
* एतस्मिन् नु खलु अक्षरे गार्गि आकाश ओतश्च प्रोतश्च। – बृहदारण्यक उपनिषद्, ३-८-११
शब्दः खे पौरुषं नृषु। – गीता, ७।८