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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

DevanagariHindipublished711 pages

Page 272 of 711

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Page 272
१८ जून, १८८३परिच्छेद ४२२४९

को बाहर लाये।

श्रीरामकृष्ण श्री मणि सेन की बैठक में आकर बैठे। इन्हीं सेन परिवारवालों की ओर से पानीहाटी में श्रीराधाकृष्ण की सेवा होती है। वे ही प्रतिवर्ष महोत्सव का आयोजन करते हैं और श्रीरामकृष्ण को निमन्त्रण देते हैं।

श्रीरामकृष्ण के कुछ विश्राम करने के बाद मणि सेन और उनके गुरुदेव नवद्वीप गोस्वामी ने उनको अलग ले जाकर प्रसाद लाकर भोजन कराया। कुछ देर बाद राम, राखाल, मास्टर, भवनाथ आदि भक्त एक दूसरे कमरे में बिठाये गये। भक्तवत्सल श्रीरामकृष्ण स्वयं खड़े हो आनन्द करते हुए उनको खिला रहे हैं।

(२)

श्रीगौरांग का महाभाव, प्रेम और तीन अवस्थाएँ।

दोपहर का समय है। राखाल, राम आदि भक्तों के साथ श्रीरामकृष्ण मणि सेन की बैठक में विराजमान हैं। नवद्वीप गोस्वामी भोजन करके श्रीरामकृष्ण के पास आ बैठे हैं।

मणि सेन ने श्रीरामकृष्ण को गाड़ी का किराया देना चाहा। श्रीरामकृष्ण बैठक में एक कोच पर बैठे हैं, "और कहते हैं गाड़ी का किराया वे लोग (राम आदि) क्यों लेंगे? वे तो पैसा कमाते हैं।"

अब श्रीरामकृष्ण नवद्वीप गोस्वामी से ईश्वरी प्रसंग करने लगे।

श्रीरामकृष्ण (नवद्वीप से) – भक्ति के परिपक्व होने पर भाव होता है, फिर महाभाव, फिर प्रेम, फिर वस्तु (ईश्वर) का लाभ होता है।

"गौरांग को महाभाव और प्रेम हुआ था।

"इस प्रेम के होने पर मनुष्य जगत् को तो भूल ही जाता है, बल्कि अपना शरीर, जो इतना प्रिय है, उसकी भी सुधि नहीं रहती। गौरांग को यह प्रेम हुआ था। समुद्र को देखते ही यमुना समझकर वे उसमें कूद पड़े!

"जीवों को महाभाव या प्रेम नहीं होता, उनको भाव तक ही होता है। फिर गौरांग को तीन अवस्थाएँ होती थीं।"

नवद्वीप – जी हाँ। अन्तर्दशा, अर्धबाह्य दशा और बाह्य दशा।

श्रीरामकृष्ण – अन्तर्दशा में वे समाधिस्थ रहते थे, अर्धबाह्य दशा में केवल नृत्य कर सकते थे, और बाह्य दशा में नामसंकीर्तन करते थे।

नवद्वीप ने अपने लड़के को लाकर श्रीरामकृष्ण से परिचित करा दिया। वे तरुण हैं – शास्त्र का अध्ययन करते हैं। उन्होंने श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया।

नवद्वीप – यह घर में शास्त्र पढ़ता है। इस देश में वेद एक प्रकार से अप्राप्य ही थे। मैक्समूलर ने उन्हें छपवाया, इसी से तो लोग अब उनको पढ़ सकते हैं।