श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context२१२ श्रीरामकृष्णवचनामृत २ जून, १८८३
गोपियों की निष्ठा-ज्ञानभक्ति और प्रेमाभक्ति
भक्त – कौन श्रेष्ठ है, ज्ञानमिश्रित भक्ति या प्रेमाभक्ति?
श्रीरामकृष्ण – ईश्वर के प्रति एकान्त अनुराग हुए बिना प्रेमाभक्ति का उदय नहीं होता। और ‘ममत्व’-ज्ञान अर्थात् भगवान् मेरे अपने हैं, यह ज्ञान। तीन मित्र जंगल में जा रहे थे, सहसा एक बाघ सामने आ खड़ा हुआ! एक आदमी बोला, ‘भाई, हम सब आज मरे।’ दूसरा आदमी बोला, ‘क्यों, मरेंगे क्यों? आओ, ईश्वर का स्मरण करें।’ तीसरा आदमी बोला, ‘नहीं, ईश्वर को कष्ट देकर क्या होगा? आओ, इसी पेड़ पर चढ़कर बैठें।’
“जिस आदमी ने कहा, ‘हम लोग मरे’ वह नहीं जानता था कि ईश्वर रक्षा करनेवाले हैं। जिसने कहा, ‘आओ, ईश्वर का स्मरण करें’ वह ज्ञानी था, वह जानता था कि ईश्वर सृष्टि, स्थिति, प्रलय के मूल कारण हैं। और जिसने कहा, ‘भगवान् को कष्ट देकर क्या होगा, आओ, पेड़ पर चढ़ बैठें’, उसके भीतर प्रेम उत्पन्न हुआ था – स्नेह-ममत्व का भाव आया था। तो प्रेम का स्वभाव ही यह है कि प्रेमी अपने को बड़ा समझता है और प्रेमास्पद को छोटा। वह देखता है, कहीं उसे कोई कष्ट न हो। उसकी यही इच्छा होती है कि जिससे प्रेम करें उसके पैर में एक काँटा भी न चुभे।”
श्रीरामकृष्णदेव तथा भक्तों को ऊपर ले जाकर अनेक प्रकार के मिष्टान्न आदि से रामबाबू ने उनकी सेवा की। भक्तों ने बड़े आनन्द से प्रसाद पाया।