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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 233 of 711

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Page 233

२१० | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २ जून, १८८३

हैं - कर वसूल करने पर ही अग्निसंस्कार करने देंगे। कितने ही शव जल रहे हैं, कितने जलकर भस्मीभूत हो गए हैं। घोर अँधेरी रात में श्मशान कितना भयावना दिखायी दे रहा है! शैब्या उस स्थान पर आकर विलाप करने लगी।”

उस करुण क्रन्दन को सुनकर, ऐसा कौन है जो व्याकुल न हो, जिसका हृदय विदीर्ण न हो? सभी श्रोतागण रो पड़े।

श्रीरामकृष्ण क्या कर रहे हैं? वे स्थिर होकर कथा सुन रहे हैं - बिलकुल स्थिर हैं! केवल एक बार आँख के कोने में एक बूँद आँसू छलक उठा पर आपने उसे पोंछ डाला। आपने अधीर होकर रुदन क्यों नहीं किया?

अन्त में रोहिताश्व को जीवनदान, सब लोगों का विश्वेश्वरदर्शन और हरिश्चन्द्र का पुनः राज्यलाभ वर्णन कर कथक महोदय ने कथा समाप्त की। श्रीरामकृष्ण बहुत समय तक वेदी के सम्मुख बैठकर कथा सुनते रहे। कथा समाप्त होने पर बाहर के कमरे में जाकर बैठे। चारों ओर भक्तमण्डली बैठी है, कथक भी पास आकर बैठ गये। श्रीरामकृष्ण कथक से बोले, “कुछ उद्धवसंवाद कहो।”

मुक्ति और भक्ति – गोपीप्रेम

कथक कहने लगे, “जब उद्धव वृन्दावन आए, गोपियाँ और ग्वालबाल उनके दर्शन के लिए व्याकुल हो दौड़कर उनके पास गए। सभी पूछने लगे, 'श्रीकृष्ण कैसे हैं? क्या वे हम लोगों को भूल गए? क्या वे कभी हम लोगों का स्मरण करते हैं?' यह कहकर कोई रोने लगा, कोई उन्हें साथ ले वृन्दावन के अनेक स्थानों को दिखलाने और कहने लगा, 'इस स्थान में श्रीकृष्ण ने गोवर्धन धारण किया था; यहाँ पर धेनुकासुर और वहाँ पर शकटासुर का वध किया था; इस मैदान में गौओं को चराते थे; इसी यमुना के तट पर वे विहार करते थे; यहाँ पर ग्वालबालों सहित क्रीड़ा करते थे; इस कुंज में गोपियों के साथ वार्तालाप करते थे।' उद्धव बोले, 'आप लोग कृष्ण के लिए इतने व्याकुल क्यों हो रहे हैं? वे तो सर्वभूतों में व्याप्त हैं। वे साक्षात् नारायण हैं! उनके सिवाय और कुछ नहीं है।' गोपियों ने कहा, 'हम यह सब नहीं समझ सकतीं। लिखना पढ़ना हमें नहीं मालूम। हम तो केवल अपने वृन्दावनविहारी कृष्ण को जानती हैं, जो यहाँ बहुत-कुछ लीला कर गए हैं।' उद्धव फिर बोले, 'वे साक्षात् नारायण हैं, उनकी चिन्ता करने से पुनः संसार में नहीं आना पड़ता, जीव मुक्त हो जाता है।' गोपियों ने कहा, 'हम मुक्ति आदि - ये सब बातें नहीं समझतीं। हम तो अपने प्राणवल्लभ कृष्ण को देखना चाहती हैं।'”

श्रीरामकृष्णदेव यह सब ध्यान से सुनते रहे और भाव में मग्न हो बोले, “गोपियों का कहना सत्य है।” यह कहकर वे अपने मधुर कण्ठ से गाने लगे। गाने का आशय यह है :-