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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished711 pages

Page 215 of 711

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Page 215

१९२ श्रीरामकृष्णवचनामृत २२ अप्रैल, १८८३

के घर में; इसी का नाम निष्काम कर्म है।* इसी का नाम है मन से त्याग। तुम लोग मन से त्याग करो। संन्यासी बाहर का त्याग और मन का त्याग दोनों ही करे।

ब्राह्मभक्त – भोग के अन्त का क्या अर्थ है?

श्रीरामकृष्ण – कामिनी-कांचन भोग है। जिस कमरे में इमली का अचार और पानी की सुराही है, उस कमरे में यदि सन्निपात का रोगी रहे, तो मुश्किल ही है। रुपया, पैसा, मान, इज्जत, शारीरिक सुख ये सब भोग एक बार न हो जाने पर, – भोग का अन्त न होने पर, – ईश्वर के लिए सभी को व्याकुलता नहीं होती।

ब्राह्मभक्त – स्त्री-जाति खराब है या हम खराब हैं?

श्रीरामकृष्ण – विद्यारूपिणी स्त्री भी है, और फिर अविद्यारूपिणी स्त्री भी है। विद्यारूपिणी स्त्री भगवान् की ओर ले जाती है और अविद्यारूपिणी स्त्री ईश्वर को भुला देती है, संसार में डुबा देती है।

“उनकी महामाया से यह जगत्-संसार हुआ है। इस माया के भीतर विद्यामाया और अविद्यामाया दोनों ही हैं। विद्यामाया का आश्रय लेने पर साधुसंग की इच्छा, ज्ञान, भक्ति, प्रेम, वैराग्य ये सब होते हैं। पंचभूत तथा इन्द्रियों के भोग के विषय अर्थात् रूप-रस-गन्ध-स्पर्श-शब्द, यह सब अविद्यामाया है। यह ईश्वर को भुला देती है।”

ब्राह्मभक्त – अविद्या यदि अज्ञान पैदा करती है तो उन्होने अविद्या को पैदा क्यों किया?

श्रीरामकृष्ण – उनकी लीला। अन्धकार न रहने पर प्रकाश की महिमा समझी नहीं जा सकती। दुःख न रहने पर सुख समझा नहीं जा सकता। बुराई का ज्ञान रहने पर ही भलाई का ज्ञान होता है।

“फिर आम पर छिलका है इसीलिए आम बढ़ता है और पकता है। आम जब तैयार हो जाता है उस समय छिलका फेंक देना पड़ता है। मायारूपी छिलका रहने पर ही धीरे धीरे ब्रह्मज्ञान होता है। विद्यामाया, अविद्यामाया, आम के छिलके की तरह हैं। दोनों ही आवश्यक हैं!”

ब्राह्मभक्त – अच्छा, साकार पूजा, मिट्टी से बनायी हुई देवमूर्ति की पूजा – ये सब क्या ठीक हैं?

श्रीरामकृष्ण – तुम लोग साकार नहीं मानते हो, अच्छी बात है। तुम्हारे लिए मूर्ति नहीं, भाव मुख्य है। तुम लोग आकर्षण मात्र को लो, जैसे श्रीकृष्ण पर राधा का आकर्षण, प्रेम। साकारवादी जिस प्रकार माँ काली, माँ दुर्गा की पूजा करते हैं, ‘माँ, माँ, कहकर

* कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। – गीता, २।४७
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥ – गीता, ९।२७

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar