श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context| १९० | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १५ अप्रैल, १८८३ |
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करने की इच्छा नहीं हो सकती।
“तुम लोग देखते हो – बाहर कैसे सुन्दर दर्शन हो रहे हैं, और आनन्द भी कितना मिलता है। जो लोग निराकार निराकार करते, कुछ नहीं पाते, उनके न है बाहर और न है भीतर।”
श्रीरामकृष्ण माता का नाम लेकर इस भाव का गीत गा रहे हैं, – “माँ, आनन्दमयी होकर मुझे निरानन्द न करना। मेरा मन तुम्हारे उन दोनो चरणों के सिवा और कुछ नहीं जानता। मैं नही जानता, धर्मराज मुझे किस दोष से दोषी बतला रहे हैं। मेरे मन में यह वासना थी कि तुम्हारा नाम लेता हुआ मैं भवसागर से तर जाऊँगा। मुझे स्वप्न में भी नहीं मालूम था कि तुम मुझे असीम सागर में डुबा दोगी। दिनरात मैं दुर्गानाम जप रहा हूँ, किन्तु फिर भी मेरी दुःखराशि दूर न हुई। परन्तु हे हरसुन्दरी, यदि इस बार भी मैं मरा तो यह निश्चय है कि संसार में फिर तुम्हारा नाम कोई न लेगा।”
श्रीरामकृष्ण फिर गाने लगे। गीत इस आशय का है –
“मेरे मन! दुर्गानाम जपो। जो दुर्गानाम जपता हुआ रास्ते में चला जाता है, शूलपाणि शूल लेकर उसकी रक्षा करते है। तुम दिवा हो, तुम सन्ध्या हो, तुम्ही रात्रि हो; कभी तो तुम पुरुष का रूप धारण करती हो, कभी कामिनी बन जाती हो। तुम तो कहती हो कि मुझे छोड़ दो, परन्तु मैं तुम्हें कदापि न छोड़ूँगा, – मैं तुम्हारे चरणों में नूपुर होकर बजता रहूँगा, – जय दुर्गा, श्रीदुर्गा कहता हुआ! माँ, जब शंकरी होकर तुम आकाश में उड़ती रहोगी तब मैं मीन बनकर पानी में रहूँगा तुम अपने नखों पर मुझे उठा लेना। हे ब्रह्ममयी, नखों के आघात से यदि मेरे प्राण निकल जायें, तो कृपा करके अपने अरुण चरणों का स्पर्श मुझे करा देना।”
श्रीरामकृष्ण ने देवी को फिर प्रणाम किया। अब सीढ़ियों से उतरते समय पुकारकर कह रहे हैं – “ओ रा – जू – हैं?” (ओ राखाल! जूते सब हैं?)
श्रीरामकृष्ण गाड़ी पर चढ़े। सुरेन्द्र ने प्रणाम किया। दूसरे भक्तों ने भी प्रणाम किया। चाँदनी अभी भी रास्ते पर पड़ रही है। श्रीरामकृष्ण की गाड़ी दक्षिणेश्वर की ओर चल दी।