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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 200 of 711

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Page 200

८ अप्रैल, १८८३ | परिच्छेद २९ | १७७

का अधिवेशन उन्हीं के यहाँ होता है। ब्राह्मसमाज के वार्षिक उत्सव में वे बहुतसे लोगों को आमन्त्रित करते हैं। श्रीरामकृष्ण को भी आमन्त्रण देते हैं। वराहनगर में मणिलाल का एक बगीचा है। वहाँ वे बहुधा अकेले आया करते हैं और उस समय श्रीरामकृष्ण के दर्शन कर जाया करते हैं। वे सचमुच बड़े हिसाबी हैं। रास्ते भर के लिए किराये की गाड़ी नहीं करते। पहले ट्राम में चढ़कर शोभाबाजार तक आते हैं; फिर वहाँ से कुछ आदमियों के साथ हिस्से में किराया देकर घोड़ागाड़ी पर चढ़कर वराहनगर आते हैं। परन्तु रुपये की कमी नहीं है। कुछ साल बाद गरीब विद्यार्थियों के लिए उन्होंने एक ही किश्त में पचीस हजार रुपये देने का बन्दोबस्त कर दिया था।

मणिलाल चुप बैठे रहे। कुछ देर इधर उधर की बातें करके बोले, “महाराज! आप तालाब खुदवाने की बात कह रहे थे। उतना कहने ही से काम हो जाता, ऊपर से तेली-तमोली कहने की क्या जरूरत थी?”

श्रीरामकृष्ण, कोई कोई भक्त मुख दबाकर हँस रहे हैं। मुसकरा भी रहे हैं।

(३)

दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण तथा ब्राह्मभक्त। प्रेमतत्त्व

कुछ देर बाद कलकत्ते से कुछ पुराने ब्राह्मभक्त आ पहुँचे। उनमें एक श्री ठाकुरदास सेन भी थे। कमरे में कितने ही भक्तों का समागम हुआ है। श्रीरामकृष्ण अपने छोटे तख्त पर बैठे हुए हैं। सहास्यवदन, बालक की-सी मूर्ति, उत्तरास्य होकर बैठे हैं। ब्राह्मभक्तों के साथ आनन्द से वार्तालाप कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण (ब्राह्म तथा दूसरे भक्तों से ) – तुम लोग 'प्रेम, प्रेम', चिल्लाते हो, पर प्रेम को क्या ऐसी साधारण वस्तु समझ लिया है? प्रेम चैतन्यदेव को हुआ था। प्रेम के दो लक्षण हैं। पहला, संसार भूल जाता है। ईश्वर पर इतना प्यार होता है कि संसार का कोई ज्ञान ही नहीं रह जाता। चैतन्यदेव वन देखकर वृन्दावन सोचते थे और समुद्र देखकर यमुना सोचते थे। दूसरा लक्षण यह है कि अपनी देह जो इतनी प्यारी वस्तु है, उस पर भी ममता नहीं रह जाती। देहात्मबोध समूल नष्ट हो जाता है।

“ईश्वर के दर्शन हुए बिना प्रेम नहीं होता।

“ईश्वरप्राप्ति के कुछ लक्षण हैं। जिसके भीतर अनुराग के ऐश्वर्य प्रकाशित हो रहे हैं, उसके लिए ईश्वरप्राप्ति में अधिक देर नहीं है।

“अनुराग के ऐश्वर्य क्या हैं, सुनोगे? विवेक, वैराग्य, जीवों पर दया, साधुसेवा, साधुसंग, ईश्वर का नाम-गुणकीर्तन, सत्यवचन, यह सब।

“अनुराग के ये सब लक्षण देखने पर ठीक ठीक कहा जा सकता है कि ईश्वरप्राप्ति में अब बहुत देर नहीं है। यदि मालिक का किसी नौकर के घर जाना ठीक हो जाए तो नौकर