श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in contextपरिच्छेद २९
दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ
(१)
मणिलाल और काशीदर्शन
चलो भाई, आज फिर भगवान् श्रीरामकृष्ण के दर्शन करने दक्षिणेश्वर मन्दिर चलें। देखें, किस तरह वे भक्तों के साथ आनन्दविलास कर रहे हैं, और किस तरह सदा ईश्वरी भाव में मस्त होकर समाधिमग्न हो रहे हैं। हम देखेंगे, कभी वे समाधिमग्न हैं, कभी कीर्तन के आनन्द में मतवाले बने हुए हैं, तो कभी प्राकृत मनुष्यों की तरह भक्तों से वार्तालाप करते हैं। मुख में ईश्वरी प्रसंग के सिवा दूसरा विषय ही नहीं। मन सदा अन्तर्मुख है। हर एक श्वास के साथ माँ का नाम जप रहे हैं। व्यवहार पाँच वर्ष के बालक की तरह है। अभिमान कहीं छू तक नहीं गया है। किसी विषय में आसक्ति नहीं, सदानन्द, सरल और उदार स्वभाव है। “ईश्वर ही सत्य हैं, और सब अनित्य, दो दिन का।” – यही एक वाणी है। चलो, उस प्रेमोन्मत्त बालक को देखने चलें। वे महायोगी हैं। अनन्त सागर के किनारे एकाकी विचरण कर रहे हैं। उस अनन्त सच्चिदानन्द सागर में मानो कुछ देख रहे हैं और देखकर प्रेमोन्मत्त बने घूम रहे हैं।
आज चैत्र की शुक्ला प्रतिपदा है। रविवार, ८ अप्रैल १८८३। कल शनिवार को अमावस्या थी। श्रीरामकृष्ण कल बलराम बाबू के घर गए थे। अमानिशा के घोर अन्धकार में महाकाली एकाकी महाकाल के साथ लीलाविलास करती हैं। इसीलिए श्रीरामकृष्ण अमावस्या के दिन स्थिर नहीं रह पाते। बालकों की-सी स्थिति है। जो दिनरात निरन्तर माँ के दर्शन कर रहा हो, माँ के बिना जो क्षण भर रह नहीं सकता, वह बालक ही तो है।
प्रातःकाल का समय है। श्रीरामकृष्ण बच्चे की तरह बैठे हुए हैं। पास ही बालकभक्त राखाल बैठे हुए हैं। मास्टर ने आकर भूमिष्ठ हो प्रणाम किया। श्रीरामकृष्ण के भतीजे रामलाल भी हैं। किशोरी तथा और भी कुछ भक्त आ गये! थोड़ी देर में पुराने ब्राह्मभक्त श्री मणिलाल मल्लिक भी आए और भूमिष्ठ हो श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया।
मणिलाल काशी गए थे। व्यवसायी आदमी हैं काशी में उनकी कोठी है।
श्रीरामकृष्ण – क्यों जी, काशी गये थे, कुछ साधु-महात्मा भी देखे?