श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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१५४ श्रीरामकृष्णवचनामृत ९ मार्च, १८८३
परन्तु यह विधि सभी अवस्था के लिए नहीं है। मेरी अब ऐसी अवस्था है कि मैं सामने रहकर बलि नहीं देख सकता हूँ।
“फिर ऐसी भी अवस्था होती है कि सर्वभूतों में ईश्वर को देखता हूँ। चीटियों में भी वे ही दिखायी देते हैं। ऐसी स्थिति में एकाएक किसी प्राणी के मरने पर मन में यही सान्त्वना होती है कि उसकी देह मात्र का विनाश हुआ। आत्मा की मृत्यु नहीं है।*
“अधिक विचार करना ठीक नहीं, माँ के चरणकमल में भक्ति रहने से ही हो जाएगा। अधिक विचार करने से तब गोलमाल हो जाता है। इस देश में तालाब का जल ऊपर ऊपर से पिओ, अच्छा साफ जल पाओगे; अधिक नीचे हाथ डालकर हिलाने से जल मैला हो जाता है। इसलिए उनसे भक्ति की प्रार्थना करो। ध्रुव की भक्ति सकाम थी, उसने राज्य पाने के लिए तपस्या की थी; परन्तु प्रह्लाद की निष्काम अहैतुकी भक्ति थी।”
भक्त – ईश्वर कैसे प्राप्त होते हैं?
श्रीरामकृष्ण – उसी भक्ति के द्वारा। परन्तु उनसे जबरदस्ती करनी होती है। दर्शन नहीं देगा तो गले में छुरा भोंक लूँगा, – इसका नाम है भक्ति का तम।
भक्त – क्या ईश्वर को देखा जाता है?
श्रीरामकृष्ण – हाँ, अवश्य देखा जाता है। निराकार-साकार दोनों ही देखे जाते हैं। चिन्मय साकार रूप का दर्शन होता है। फिर साकार मनुष्य रूप में भी वे प्रत्यक्ष हो सकते हैं। अवतार को देखना और ईश्वर को देखना एक ही है। ईश्वर ही युग युग में मनुष्य के रूप में अवतीर्ण होते हैं^\dagger।
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* न हन्यते हन्यमाने शरीरे। (गीता, २।२०)
† धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे। (गीता, ४।८)
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