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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished711 pages

Page 170 of 711

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Page 170

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परिच्छेद २३

बेलघर में गोविन्द मुखोपाध्याय के मकान पर

श्रीरामकृष्ण ने बेलघर के श्री गोविन्द मुखोपाध्याय के मकान पर शुभागमन किया है। रविवार, १८ फरवरी १८८३ ई.। नरेन्द्र, राम आदि भक्तगण आये हैं, पड़ोसीगण भी आये हैं। सबेरे सात-आठ बजे के समय श्रीरामकृष्ण ने नरेन्द्र आदि के साथ संकीर्तन में नृत्य किया था।

कीर्तन के बाद सभी बैठ गये। कई लोग श्रीरामकृष्ण को प्रणाम कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण बीच बीच में कह रहे हैं, “ईश्वर को प्रणाम करो।” फिर कह रहे हैं, “वे ही सब रूपों में हैं। परन्तु किसी किसी स्थान पर उनका विशेष प्रकाश है – जैसे साधुओं में। यदि कहो, दुष्ट लोग भी हैं, बाघ-सिंह भी तो हैं, तो वह ठीक है, परन्तु बाघरूपी नारायण से आलिंगन करने की आवश्यकता नहीं है, उसे दूर से प्रणाम करके चले जाना चाहिए। फिर देखो जल। कोई जल पिया जाता है, किसी जल से पूजा की जाती है, किसी जल से स्नान किया जाता है और फिर किसी जल से केवल हाथमुँह धोया जाता है।”

पड़ोसी – वेदान्त का क्या मत है?

श्रीरामकृष्ण – वेदान्तवादी कहते हैं, 'सोऽहं'। ब्रह्म सत्य, जगत् मिथ्या है। 'मैं' भी मिथ्या है, केवल वह परब्रह्म ही सत्य है।

“परन्तु 'मैं' तो नहीं जाता। इसलिए मैं उनका दास, मैं उनकी सन्तान, मैं उनका भक्त, यह अभिमान बहुत अच्छा है।

“कलियुग में भक्तियोग ही ठीक है। भक्ति द्वारा भी उन्हें प्राप्त किया जाता है। देहबुद्धि के रहने से विषयबुद्धि होती ही है। रूप, रस, गंध, स्पर्श – ये सब विषय हैं। विषयबुद्धि दूर होना बहुत कठिन है। विषयबुद्धि के रहते 'सोऽहं' नहीं होता।*

“संन्यासियों में विषयबुद्धि कम है। संसारीगण सदैव विषयचिन्ता लेकर ही रहते हैं, इसलिए संसारियों के लिए 'दासोऽहं' ”

पड़ोसी – हम पापी हैं, हमारा क्या होगा?

श्रीरामकृष्ण – उनका नाम-गुणगान करने से देह से सब पाप भाग जाते हैं। देहरूपी


* अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते। (गीता, १२।५)

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar