श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context१४२ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १ जनवरी, १८८३
नजर आते हैं।
“ब्रह्मज्ञान होने पर संसार की आसक्ति चली जाती है, काम-कांचन के लिए उत्साह नहीं रहता – सब शान्त हो जाता है। काठ जब जलता है तब उसमें चटाचट आवाज होती है और कडुवा धुआँ भी निकलता है। जब सब जलकर खाक हो जाता है, तब फिर शब्द नहीं होता। आसक्ति के जाते ही उत्साह भी चला जाता है। अन्त में केवल शान्ति रह जाती है।
“ईश्वर की ओर कोई जितना ही बढ़ता है, उतनी ही शान्ति मिलती है। शान्तिः शान्तिः शान्तिः प्रशान्तिः। गंगा के निकट जितना ही जाया जाता है, उतना ही शीतलता का अनुभव होता जाता है। नहाने पर और भी शान्ति मिलती है।
“परन्तु जीव, जगत, चौबीस तत्त्व, इनकी सत्ता उन्हीं की सत्ता से भासित हो रही है। उन्हें छोड़ देने पर कुछ भी नहीं रह जाता। एक के बाद शून्य रखने से संख्या बढ़ जाती है। एक को निकाल डालो तो शून्य का कोई अर्थ नहीं रह जाता।”
प्राणकृष्ण पर कृपा करने के लिए श्रीरामकृष्ण अपनी अवस्था के सम्बन्ध में कह रहे हैं।
ब्रह्मज्ञान के उपरान्त ‘भक्ति का मैं’
श्रीरामकृष्ण – ब्रह्मज्ञान के पश्चात् समाधि के पश्चात्, कोई कोई नीचे उतरकर ‘विद्या का मैं’, ‘भक्ति का मैं’ लेकर रहते हैं। हाट का क्रय-विक्रय समाप्त हो जाने पर भी कुछ लोग अपनी इच्छानुसार हाट में ही रह जाते हैं, जैसे नारद आदि। वे ‘भक्ति का मैं’ लेकर लोकशिक्षा के लिए संसार में रहते हैं। शंकराचार्य ने लोकशिक्षा के लिए ‘विद्या का मैं’ रखा था।
“आसक्ति का नाममात्र भी रहते वे नहीं मिल सकते। सूत के रेशे निकले हुए हों तो वह सुई के भीतर नहीं जा सकता।
“जिन्होंने ईश्वर को प्राप्त कर लिया है, उनके काम-क्रोध नाममात्र के हैं, जैसे जली रस्सी, – रस्सी का आकार तो है परन्तु फूकने से ही उड़ जाती है।
“मन से आसक्ति के चले जाने पर उनके दर्शन होते हैं। शुद्ध मन से जो निकलेगी, वह उन्हीं की वाणी है। शुद्ध मन जो है, शुद्ध बुद्धि भी वही है और शुद्ध आत्मा भी वही है; क्योंकि उन्हें छोड़ कोई दूसरा शुद्ध नहीं है।
“परन्तु उन्हें पा लेने पर लोग धर्माधर्म को पार कर जाते हैं।”
इतना कहकर श्रीरामकृष्ण मधुर कण्ठ से भक्त रामप्रसाद का एक गीत गाने लगे। उसका मर्म यह है –
“मन, चल, सैर करने चले। कालीरूपी कल्पलता के नीचे तुझे चारों फल मिल