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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

DevanagariHindipublished711 pages

Page 157 of 711

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Page 157
१३४श्रीरामकृष्णवचनामृतदिसम्बर १८८२

श्रीरामकृष्ण – क्या ईश्वर का काम, वे किस उद्देश्य से क्या करते हैं समझा जा सकता है? वे सृष्टि, पालन, संहार सभी कर रहे हैं। वे क्यों संहार कर रहे हैं, हम क्या समझ सकते हैं? मैं कहता हूँ, माँ, मुझे समझने की आवश्यकता भी नहीं है। बस, अपने चरणकमल में भक्ति दो। मनुष्य-जीवन का उद्देश्य है इसी भक्ति को प्राप्त करना। और सब माँ जानें। बगीचे में आम खाने को आया हूँ, कितने पेड़, कितनी शाखाएँ, कितने करोड़ पत्ते हैं – यह सब हिसाब करने से मुझे क्या मतलब? मैं आम खाता हूँ, पेड़ और पत्तों के हिसाब से मेरा क्या सम्बन्ध?

आज रात में बाबूराम, मास्टर और रामदयाल श्रीरामकृष्ण के कमरे में जमीन पर सोये।

आधी रात, दो-तीन बजे का समय होगा, श्रीरामकृष्ण के कमरे में बत्ती बुझ गयी है। वे स्वयं बिस्तर पर बैठे बीच बीच में भक्तों के साथ बातें कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण और बाबूराम, मास्टर प्रभृति भक्त – दया और माया – कठिन साधना और ईश्वर दर्शन

श्रीरामकृष्ण (मास्टर आदि भक्तों के प्रति) – देखो, दया और माया ये दो पृथक् पृथक् चीजें हैं। माया का अर्थ है, आत्मीयों के प्रति ममता – जैसे बाप, माँ, भाई, बहन, स्त्री, पुत्र इन पर प्रेम। दया का अर्थ है सर्व भूतों में प्रेम, समदृष्टि। किसी में यदि दया देखो, जैसे विद्यासागर में, तो उसे ईश्वर की दया जानो। दया से सर्वभूतों की सेवा होती है। माया भी ईश्वर की ही है। माया द्वारा वे आत्मीयों की सेवा करा लेते हैं। पर इसमें एक बात है। माया अज्ञानी बनाकर रखती है और बद्ध बनाती है। परन्तु दया से चित्तशुद्धि होती है और धीरे धीरे बन्धन-मुक्ति होती है।

चित्तशुद्धि हुए बिना भगवान् के दर्शन नहीं होते। काम, क्रोध, लोभ, इन सब पर विजय प्राप्त करने से उनकी कृपा होती है, तब उनके दर्शन होते हैं। तुम लोगों को बहुत ही गुप्त बातें बता रहा हूँ। काम पर विजय प्राप्त करने के लिए मैंने बहुतकुछ किया था। आनन्द-आसन के चारों ओर 'जय काली' जय काली' कहते हुए कई बार प्रदक्षिणा की थी।

“मेरी दस-ग्यारह वर्ष की उम्र में, जब उस देश में था, उस समय वह स्थिति-समाधि की स्थिति – प्राप्त हुई थी। मैदान में से जाते जाते जो कुछ देखा उससे मैं विह्वल हो पड़ा था। ईश्वरदर्शन के कुछ लक्षण हैं। ज्योति देखने में आती है, आनन्द होता है, हृदय के बीच में गुर-गुर करके महावायु उठती है।”

दूसरे दिन बाबूराम, रामदयाल घर लौट गए। मास्टर ने वह दिन व रात्रि श्रीरामकृष्ण के साथ बितायी। उस दिन उन्होंने मन्दिर मे ही प्रसाद पाया।

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