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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

DevanagariHindipublished711 pages

Page 141 of 711

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Page 141

११८ श्रीरामकृष्णवचनामृत १४ दिसम्बर १८८२

पार्षद अद्वैत गोस्वामी विजय के पूर्वपुरुष हैं। अद्वैत गोस्वामी ज्ञानी थे, निराकार परब्रह्म के चिन्तन में लीन रहते थे; पर साथ ही उन्होंने भक्ति की भी पराकाष्ठा दिखायी है। वे हरिप्रेम में मतवाले होकर नृत्य करते थे – इतने आत्मविस्मृत हो जाते थे कि नाचते नाचते अंग से वस्त्र तक खिसक जाते थे। विजय भी ब्रह्मसमाज में आए हैं, निराकार परब्रह्म का चिन्तन करते हैं; परन्तु अपने पूर्वज अद्वैत गोस्वामी के पवित्र रक्त की धारा उनकी देह में प्रवाहित हो रही है। हृदय में भगवत्प्रेम का अंकुर प्रकाशोन्मुख है, केवल समय की प्रतीक्षा कर रहा है। इसीलिए वे भगवान् श्रीरामकृष्ण की अपूर्व भगवत्प्रेमोन्मत्त अवस्था को देखकर मुग्ध हुए हैं। मन्त्रमुग्ध सर्प जिस प्रकार सँपेरे के सामने फन निकाले बैठा रहता है, उसी प्रकार विजय भी श्रीरामकृष्ण के श्रीमुख से निकलने वाले भगवत्प्रसंग को सुनते हुए मुग्ध होकर उनके पास बैठे रहते हैं। फिर वे जब भगवत्प्रेम में बालकों की भाँति नृत्य करने लगते हैं तब विजय भी उनके साथ नाचने लग जाते हैं।

विष्णु 'एंड़ेदह' में रहता था। उसने गले में छुरा लगाकर आत्महत्या कर ली। आज उसी की चर्चा हो रही है।

श्रीरामकृष्ण – देखो, उस लड़के ने आत्महत्या कर ली, जब से यह सुना, मन दुखी हो रहा है। यहाँ आता था, स्कूल में पढ़ता था, पर कहता था – संसार अच्छा नहीं लगता। पश्चिम चला गया था, किसी आत्मीय के यहाँ कुछ दिन ठहरा था। वहाँ निर्जन वन में, मैदान में, पहाड़ पर बैठा हुआ सदा ध्यान करता था। उसने मुझसे कहा था, न जाने ईश्वर के कितने रूपों के दर्शन करता हूँ।

“जान पड़ता है, यह अन्तिम जन्म था। पूर्वजन्म में बहुत-कुछ काम उसने कर डाला था। कुछ बाकी रह गया था, वह भी जान पड़ता है इस जन्म में पूरा हो गया।

‘पूर्वजन्म का संस्कार मानना चाहिए। मैंने सुना है, एक मनुष्य शवसाधना कर रहा था। घने जंगल में भगवती की आराधना कर रहा था। परन्तु वह अनेक प्रकार की विभीषिकाएँ देखने लगा। अन्त को उसे बाघ पकड़ ले गया। वहीं एक और आदमी बाघ के भय से पास के एक पेड़ पर चढ़कर बैठा हुआ था। शव तथा पूजा की अन्य सामग्रियाँ इकट्ठी देखकर वह उतर पड़ा। और आचमन करके शव के ऊपर बैठ गया। कुछ जप करते ही माँ प्रकट होकर बोलीं, ‘मैं तुझ पर प्रसन्न हूँ – तू वर माँग।’ माता के पादपंकजों में प्रणत होकर वह बोला, ‘माँ, एक बात पूछता हूँ। तुम्हारा कार्य देखकर बड़ा आश्चर्य होता है। उस मनुष्य ने इतनी मेहनत की, इतना आयोजन किया, इतने दिनों से तुम्हारी साधना कर रहा था, उस पर तो तुम्हारी कृपा न हुई; प्रसन्न तुम मुझ पर हुई जो भजन-साधन-ज्ञान-भक्ति आदि कुछ नहीं जानता।’ हँसकर भगवती बोलीं, ‘बेटा, तुम्हें जन्मान्तर की बात याद नहीं है। तुम जन्म जन्म से मेरे लिए तपस्या कर रहे हो। उसी साधनबल से इस प्रकार सब कुछ तैयार पाया और तुम्हें मेरे दर्शन भी मिले। अब कहो,