श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in contextपरिच्छेद १७
मनोमोहन तथा सुरेन्द्र के मकान पर श्रीरामकृष्ण
रविवार, १९ नवम्बर १८८२ ई.। आज श्रीजगद्धात्री-पूजा है। सुरेन्द्र ने निमन्त्रण दिया है। वे भीतर बाहर हो रहे हैं - कब श्रीरामकृष्ण आते हैं। मास्टर को देख वे कह रहे हैं, “तुम आए हो, और वे कहाँ हैं?” इतने में श्रीरामकृष्ण की गाड़ी आ खड़ी हुई। पास ही श्रीमनोमोहन का मकान है। श्रीरामकृष्ण पहले वहीं पर उतरे, वहाँ पर जरा विश्राम करके सुरेन्द्र के मकान पर जाएँगे।
मनोमोहन के बैठकखाने में श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, “जो असहाय, दीन, दरिद्र है उसकी भक्ति ईश्वर को प्यारी है, जिस प्रकार खली मिला हुआ चारा गाय को प्यारा है। दुर्योधन उतना धन, उतना ऐश्वर्य दिखाने लगा पर उसके घर पर भगवान् न गए। वे विदुर के घर गए। वे भक्तवत्सल हैं। जिस प्रकार गाय अपने बच्चे के पीछे पीछे दौड़ती है, उसी प्रकार वे भी भक्तों के पीछे पीछे दौड़ते हैं।”
श्रीरामकृष्ण गाने लगे। भावार्थ यह है -
“‘उस भाव के लिए परम योगी युगयुगान्तर तक योग करते हैं। भाव का उदय होने पर वे ऐसे ही खींच लेते हैं जैसे लोहे को चुम्बक।’
“चैतन्यदेव की आँखों से कृष्णनाम से आँसू गिरने लगते थे। ईश्वर ही वस्तु है, शेष सब अवस्तु। मनुष्य चाहे तो ईश्वर को प्राप्त कर सकता है; परन्तु वह कामिनी-कांचन का भोग करने में ही मस्त रहता है। सिर पर मणि रहते भी साँप मेंढ़क खाता रहता है।
“भक्ति ही सार है। ईश्वर का विचार करके भी उन्हें कौन जान सकेगा? मुझे भक्ति चाहिए। उनका अनन्त ऐश्वर्य है। उतना जानने की मुझे क्या आवश्यकता है? एक बोतल शराब से यदि नशा आ जाए तो फिर यह जानने की क्या आवश्यकता है कि कलार की दूकान में कितने मन शराब है। एक लोटा जल से मेरी तृष्णा शान्त हो सकती है; पृथ्वी में कितना जल है यह जानने की मुझे कोई आवश्यकता नहीं।”
सुरेन्द्र के भाई और जज - का पद। जातिभेद
श्रीरामकृष्ण अब सुरेन्द्र के मकान पर आये हैं। आकर दुमँजले के बैठकघर में बैठे हैं। सुरेन्द्र के मंझले भाई जज हैं। वे भी बैठे हैं। अनेक भक्त कमरे में इकट्ठे हुए हैं।