श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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| १०८ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २८ अक्टूबर, १८८२ |
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चारों ओर के ग्रामवासीगण हरिनाम सुन रहे हैं और मन ही मन बगीचे के मालिक वेणीमाधव को कितना धन्यवाद दे रहे हैं।
कीर्तन हो जाने पर श्रीरामकृष्ण ने जगन्माता को भूमिष्ठ हो प्रणाम किया। प्रणाम करते हुए कह रहे हैं, “भागवत भक्त भगवान, ज्ञानी के चरणों में प्रणाम है, साकारवादी भक्तों और निराकारवादी भक्तों के चरणों में प्रणाम है, पहले के ब्रह्मज्ञानियों के चरणों में और आजकल के ब्राह्मसमाज के ब्रह्मज्ञानियों के चरणों में प्रणाम है।”
वेणीमाधव ने अच्छे से अच्छे रुचिकर पकवान भक्तों को खिलाए। श्रीरामकृष्ण ने भी भक्तों के साथ आनन्दपूर्वक प्रसाद पाया।
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CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar