श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in context७२० श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग
चौंतीसवाँ अध्याय
गणेशेशदानविधि
| सनत्कुमार उवाच<br>गणेशेशं प्रवक्ष्यामि दानं पूर्वोक्तमण्डपे।<br>सम्पूज्य देवदेवेशं लोकपालसमावृतम्॥ १॥<br><br>विश्वेश्वरान् यथाशास्त्रं सर्वाभरणसंयुतान्।<br>दशनिष्केण वै कृत्वा सम्पूज्य च विधानतः॥ २॥<br><br>अष्टदिक्ष्वष्टकुण्डेषु पूर्ववद्धोममाचरेत्।<br>पञ्चावरणमार्गेण पारम्पर्यक्रमेण च॥ ३॥<br><br>सप्तविप्रान् समभ्यर्च्य कन्यामेकां तथोत्तरे।<br>दापयेत्सर्वमन्त्राणि स्वैःस्वैर्मन्त्रैरनुक्रमात्॥ ४॥<br><br>दत्त्वैवं सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः॥ ५॥ | सनत्कुमार बोले—अब मैं गणेशेशदानका वर्णन करूँगा। पूर्वमें बतायी गयी रीतिसे निर्मित किये गये मण्डपमें लोकपालोंसहित देवदेवेश्वर सदाशिवका पूजन करके दस निष्क सुवर्णसे आठों दिक्पालोंकी प्रतिमा बनाकर उन्हें यथाशास्त्र सभी आभरणोंसे विभूषित करके विधिपूर्वक उनका पूजनकर आठों दिशाओंमें आठ कुण्डोंमें पंचावरण मार्गसे तथा परम्पराक्रमसे पूर्वकी भाँति होम करना चाहिये॥ १–३॥<br><br>तत्पश्चात् सात विप्रोंकी तथा उत्तर दिशामें एक कन्याकी विधिपूर्वक पूजा करके अनुक्रमसे अपने-अपने देवतामन्त्रोंसे सभी देवप्रतिमाओंका दान कर देना चाहिये। इस प्रकार दान करके मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ४-५॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे गणेशेशदानविधिनिरूपणं नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'गणेशेशदानविधिनिरूपण' नामक चौंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३४॥
पैंतीसवाँ अध्याय
सुवर्णधेनुदानविधि
| सनत्कुमार उवाच<br>अथ ते सम्प्रवक्ष्यामि हेमधेनुविधिक्रमम्।<br>सर्वपापप्रशमनं ग्रहदुर्भिक्षनाशनम्॥ १॥<br><br>उपसर्गप्रशमनं सर्वव्याधिनिवारणम्।<br>निष्काणां च सहस्रेण सुवर्णेन तु कारयेत्॥ २॥<br><br>तदर्धेनापि वा सम्यक् तदर्धार्धेन वा पुनः।<br>शतेन वा प्रकर्तव्या सर्वरूपगुणान्विता॥ ३॥<br><br>गोरूपं सुखुरं दिव्यं सर्वलक्षणसंयुतम्।<br>खुराग्रे विन्यसेद्वज्रं शृङ्गे वै पद्मरागकम्॥ ४॥<br><br>भ्रुवोर्मध्ये न्यसेद्दिव्यं मौक्तिकं मुनिसत्तमाः।<br>वैडूर्येण स्तनाः कार्या लाङ्गूलं नीलतः शुभम्॥ ५॥ | सनत्कुमार बोले—अब मैं आपसे हेमधेनुके दानकी विधिका वर्णन करूँगा; यह सभी पापोंका नाश करनेवाला, ग्रह तथा दुर्भिक्षका शमन करनेवाला, उपद्रवोंको शान्त करनेवाला और समस्त व्याधियोंको दूर करनेवाला है॥ १ १/२॥<br><br>हजार सुवर्णमुद्राओंसे एक गौ बनानी चाहिये; अथवा उसके आधे अथवा उसके भी आधे अथवा एक सौ स्वर्णमुद्राओंसे सभी लक्षणों तथा गुणोंसे समन्वित धेनुका निर्माण कराना चाहिये। वह गोप्रतिमा सुन्दर खुरोंवाली, दिव्य तथा सभी लक्षणोंसे युक्त होनी चाहिये॥ २-३ १/२॥<br><br>हे श्रेष्ठ मुनियो! खुरोंके अग्र भागमें हीरा तथा सींगोंमें पद्मराग लगाना चाहिये और दोनों भौंहोंके |