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श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished833 pages

Page 720 of 834

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Page 720
७१८श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| पद्ममष्टदलं कुर्यात्कर्णिकाकेसरान्वितम्।<br>दशनिष्केण तत्कार्यं तदर्धार्धेन वा पुनः॥ ३<br><br>तिलमध्ये न्यसेत्पद्मं पद्ममध्ये महेश्वरम्।<br>आराध्य विधिवद्देवं वामादीनि प्रपूजयेत्॥ ४<br><br>शक्तिरूपं सुवर्णेन त्रिनिष्केण तु कारयेत्।<br>न्यासं तु परितः कुर्याद्विघ्नेशान् परिभागतः॥ ५<br><br>पूर्वोक्तहेममानेन विघ्नेशानपि कारयेत्।<br>तानभ्यर्च्य विधानेन गन्धपुष्पादिभिः क्रमात्॥ ६ | तदनन्तर कर्णिका तथा केसरसे युक्त सुवर्णका अष्टदल कमल बनाना चाहिये। इसे दस निष्क अथवा उसके आधे अथवा उसके भी आधे प्रमाणवाले सुवर्णसे निर्मित करना चाहिये। इस [अष्टदल] कमलको तिलके मध्य रखना चाहिये और कमलके बीच शिवजीकी विधिवत् आराधना करके उनकी वामदेव आदि मूर्तियोंकी पूजा करनी चाहिये। तीन निष्क सुवर्णके द्वारा शक्तिकी प्रतिमा बनानी चाहिये। इसी प्रकार आठों दिशाओंमें अष्ट विनायकोंकी स्थापना करनी चाहिये। पूर्वमें कहे गये तीन निष्क सुवर्णसे विघ्नेश्वरोंकी भी प्रतिमा बनानी चाहिये। विधिपूर्वक गन्ध, पुष्प आदिके द्वारा क्रमसे उनकी पूजा करके दानादि शेष क्रियाएँ पूर्वोक्त क्रमसे करें॥ ३-६॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे सूक्ष्मपर्वतदानविधानवर्णनं नामैकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'सूक्ष्मपर्वतदानविधानवर्णन' नामक इकतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३१ ॥


बत्तीसवाँ अध्याय

सुवर्णपृथ्वीमहादानविधि

| सनत्कुमार उवाच<br>जपहोमार्चनादानाभिषेकाद्यं च पूर्ववत्।<br>सुवर्णमेदिनीदानं प्रवक्ष्यामि समासतः॥ १<br><br>पूर्वोक्तदेशकाले तु कारयेन्मुनिभिः सह।<br>लक्षणेन यथापूर्वं कुण्डे वा मण्डलेऽथ वा॥ २ | सनत्कुमार बोले—अब मैं सुवर्णमेदिनीदानका संक्षेपमें वर्णन करूँगा। जप, होम, पूजा, दान, अभिषेक आदि कृत्य पूर्वोक्त देशकालमें पूर्वकी भाँति मुनियोंके द्वारा सम्पन्न कराये जाने चाहिये। यह कार्य पूर्वकथित लक्षणकी भाँति कुण्डमें या मण्डलमें किया जाना चाहिये॥ १-२॥ |
| मेदिनीं कारयेद्दिव्यां सहस्रेणापि वा पुनः।<br>एकहस्ता प्रकर्तव्या चतुरस्त्रा सुशोभना॥ ३<br><br>सप्तद्वीपसमुद्राद्यैः पर्वतैरभिसंवृता।<br>सर्वतीर्थसमोपेता मध्ये मेरुसमन्विता॥ ४<br><br>अथवा मध्यतो द्वीपं नवखण्डं प्रकल्पयेत्।<br>पूर्ववन्निखिलं कृत्वा मण्डले वेदिमध्यतः॥ ५<br><br>सप्तभागैकभागेन सहस्राद्विधिपूर्वकम्।<br>शिवभक्ते प्रदातव्या दक्षिणा पूर्वचोदिता॥ ६ | एक हजार सुवर्णमुद्राओंसे अथवा उसके आधे अथवा उसके आधेसे दिव्य पृथ्वीका आकार बनाना चाहिये। उसे चौकोर, अत्यन्त सुन्दर तथा एक हाथ लम्बी-चौड़ी बनाये। वह सात द्वीपों, समुद्रों तथा पर्वतोंसे घिरी हुई हो; सभी तीर्थोंसे युक्त हो तथा मध्यमें मेरुसे सुशोभित हो। मध्य भागमें नौखण्डोंके साथ जम्बूद्वीपका निर्माण करे। मण्डलमें वेदीके मध्य पूर्वकी भाँति सम्पूर्ण कृत्य करके सहस्र स्वर्णमुद्राओंके सातवें भागको शिवभक्तको विधिपूर्वक देना चाहिये; इसमें |