श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished833 pages
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| ७१४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| जयमङ्गलशब्दादिब्रह्मघोषैः सुशोभनैः।<br>नृत्यवाद्यादिभिर्गीतैः सर्वशोभासमन्वितैः॥ ७७<br>स्वमेवं चन्द्रदिग्भागे सुवर्णं तत्र विक्षिपेत्।<br>तुलाधारौ समौ वृत्तौ तुलाभारः सदा भवेत्॥ ७८<br>शतनिष्काधिकं श्रेष्ठं तदर्धं मध्यमं स्मृतम्।<br>तस्यार्धं च कनिष्ठं स्यात्त्रिविधं तत्र कल्पितम्॥ ७९ | किया जाना चाहिये और जय आदि मांगलिक शब्दों, परम सुन्दर वेदध्वनियों तथा सब प्रकारकी शोभासे युक्त नृत्य-वाद्य-गीत आदिके साथ उत्तर दिशाभागमें स्थित पलड़ेपर अपने भारके बराबर सुवर्ण रखे, ताकि तुलाके दोनों पलड़े समान हो जायँ; इस प्रकार तुलाभार सदा अक्षय बना रहे। सौ निष्कसे अधिक परिमाणवाली तुला श्रेष्ठ, पचास निष्कवाली मध्यम और पचीस निष्कवाली कनिष्ठ कही गयी है—इस प्रकार तुला तीन प्रकारकी कही गयी है॥ ७२—७९॥ |
| वस्त्रयुग्ममथोष्णीषं कुण्डलं कण्ठशोभनम्।<br>अङ्गुलीभूषणं चैव मणिबन्धस्य भूषणम्॥ ८०<br>एतानि चैव सर्वाणि प्रारम्भे धर्मकर्मणि।<br>पाशुपतव्रतायाथ भस्माङ्गाय प्रदापयेत्॥ ८१ | अग्रपूजाके प्रारम्भमें दोनों वस्त्र, उष्णीष, कुण्डल, कण्ठहार, अँगूठी तथा मणिबन्धभूषण (कंकण)—ये सभी वस्तुएँ भस्मराग धारण किये हुए पाशुपतव्रतमें निरत शैवाचार्यको प्रदान कराने चाहिये। |
| पूर्वोक्तभूषणं सर्वं सोष्णीषं वस्त्रसंयुतम्।<br>दद्यादेतत्प्रयोक्तृभ्य आच्छादनपटं बुधः॥ ८२<br>दक्षिणां च शतं सार्धं तदर्धं वा प्रदापयेत्।<br>योगिनां चैव सर्वेषां पृथङ्निष्कं प्रदापयेत्॥ ८३<br>यागोपकरणं दिव्यमाचार्याय प्रदापयेत्।<br>इतरेषां यतीनां तु पृथङ्निष्कं प्रदापयेत्॥ ८४ | बुद्धिमान्को चाहिये कि पूर्वोक्त आभूषण, वस्त्रयुक्त उष्णीष एवं उत्तरीय—यह सब ऋत्विजोंको प्रदान करे और एक सौ पचास अथवा उसका आधा निष्क सुवर्णकी दक्षिणा प्रदान करे। साथ ही सभी योगियोंको अलगसे सुवर्णमुद्रा प्रदान करे। इस अवसरपर दिव्य यागोपकरण आचार्यको प्रदान करे और अन्य यतियोंको पृथक् रूपसे सुवर्णमुद्रा प्रदान करे। |
| तुलारोहसुवर्णं च शिवाय विनिवेदयेत्।<br>प्रासादं मण्डपं चैव प्राकारं भूषणं तथा॥ ८५<br>सुवर्णपुष्पं पटहं खड्गं वै कोशमेव च।<br>कृत्वा दत्त्वा शिवायाथ किञ्चिच्छेषं च बुद्धिमान्॥ ८६<br>आचार्येभ्यः प्रदातव्यं भस्मार्द्धेभ्यो विशेषतः।<br>बन्दीकृतान् विसृज्याथ कारागृहनिवासिनः॥ ८७ | बुद्धिमान्को चाहिये कि तुलापर रखे हुए सुवर्ण तथा प्रासाद, मण्डप, प्राकार, आभूषण, सुवर्णपुष्प, पटह, खड्ग, कोश—इन सबको एकत्र करके इनमेंसे कुछ भाग बचाकर शिवको प्रदान कर दे और बचे हुए भागको विशेषरूपसे भस्मधारी आचार्योंको प्रदान करे। |
| सहस्रकलशैस्तत्र सेचयेत्परमेश्वरम्।<br>घृतेन केवलैनापि देवदेवमुमापतिम्॥ ८८<br>पयसा वाथ दध्ना वा सर्वद्रव्यैरथापि वा।<br>ब्रह्मकूर्चेन वा देवं पञ्चगव्येन वा पुनः॥ ८९<br>गायत्र्या चैव गोमूत्रं गोमयं प्रणवेन वा।<br>आप्यायस्वेति वै क्षीरं दधिक्राव्णोति वै दधि॥ ९०<br>तेजोऽसीत्याज्यमीशानमन्त्रेणैवाभिषेचयेत् ।<br>देवस्यत्वेति देवेशं कुशाम्बुकलशेन वै॥ ९१<br>रुद्राध्यायेन वा सर्वं स्नापयेत्परमेश्वरम्।<br>सहस्रकलशं शम्भोर्नाम्नां चैव सहस्रकैः॥ ९२ | कारागारमें स्थित बन्दियोंको मुक्त करके सहस्र कलशोंके जलसे अथवा केवल घृतसे, दूधसे, दहीसे अथवा नारिकेल आदिके जलसे देवदेव परमेश्वर उमापतिका अभिषेक करना चाहिये; अथवा ब्रह्मकूर्चके द्वारा पंचगव्यसे शिवजीका अभिषेक करना चाहिये। गायत्रीमन्त्रसे गोमूत्र, प्रणवमन्त्रसे गोमय, 'आप्यायस्व०'—मन्त्रसे दूध, 'दधिक्राव्णो०'—मन्त्रसे दही तथा 'तेजोऽसीति०'—मन्त्रसे घृत ग्रहणकर ईशानमन्त्रसे ही अभिषेक करना चाहिये। 'देवस्य त्वा०'—इस मन्त्रके द्वारा कलशमें स्थित कुशाम्बुसे देवेशका अभिषेक करे अथवा रुद्राध्यायके द्वारा परमेश्वर शिवका अभिषेक करे। भगवान् विष्णुके द्वारा |