श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
by महर्षि वेदव्यास
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६९४ | श्रीलिङ्गमहापुराण
| वज्रं शक्तिं च दण्डं च खड्गं पाशं ध्वजं तथा।<br>गदां त्रिशूलं क्रमशः प्रथमावरणे स्मृताः॥ ७४<br>युद्धा प्रबुद्धा चण्डा च मुण्डा चैव कपालिनी।<br>मृत्युहन्त्री विरूपाक्षी कपर्दा कमलासना॥ ७५<br>दंष्ट्रिणी रङ्गिणी चैव लम्बाक्षी कङ्कभूषणी।<br>सम्भावा भाविनी चैव षोडशैव प्रकीर्तिताः॥ ७६<br>कथितः कनकव्यूहो ह्यम्बिकाख्यं शृणुष्व मे।<br>खेचरी चात्मनासा च भवानी वह्निरूपिणी॥ ७७<br>वह्निनी वह्निनाभा च महिमामृतलालसा।<br>प्रथमावरणे चाष्टौ शक्तयः सर्वसम्मताः॥ ७८<br>क्षमा च शिखरा देवी ऋतुरत्ना शिला तथा।<br>छाया भूतपनी धन्या इन्द्रमाता च वैष्णवी॥ ७९<br>तृष्णा रागवती मोहा कामकोपा महोत्कटा।<br>इन्द्रा च बधिरा देवी षोडशैताः प्रकीर्तिताः॥ ८० | वज्र, शक्ति, दण्ड, खड्ग, पाश, ध्वज, गदा और त्रिशूल—ये क्रमानुसार प्रथम आवरणकी [आयुधरूप] शक्तियाँ कही गयी हैं। युद्धा, प्रबुद्धा, चण्डा, मुण्डा, कपालिनी, मृत्युहन्त्री, विरूपाक्षी, कपर्दा, कमला, आसना, दंष्ट्रिणी, रंगिणी, लम्बाक्षी, कंकभूषणी, सम्भावा तथा भाविनी—ये [द्वितीय आवरणकी] सोलह शक्तियाँ बतायी गयी हैं। कनकव्यूहका वर्णन कर दिया गया, अब अम्बिका नामक व्यूहके विषयमें सुनिये। खेचरी, आत्मनासा, भवानी, वह्निरूपिणी, वह्निनी, वह्निनाभा, महिमा और अमृतलालसा—ये प्रथम आवरणकी आठ सर्वसम्मत शक्तियाँ कही गयी हैं। उसी प्रकार क्षमा, शिखरादेवी, ऋतुरत्ना, शिला, छाया, भूतपनी, धन्या, इन्द्रमाता, वैष्णवी, तृष्णा, रागवती, मोहा, कामकोपा, महोत्कटा, इन्द्रा और बधिरादेवी—ये सोलह शक्तियाँ [द्वितीय आवरणकी] कही गयी हैं॥ ७४-८०॥ |
| कथितश्चाम्बिकाव्यूहः श्रीव्यूहं शृणु सुव्रत।<br>स्पर्शा स्पर्शवती गन्धा प्राणापाना समानिका॥ ८१<br>उदाना व्याननामा च प्रथमावरणे स्मृताः।<br>तमोहता प्रभामोघा तेजिनी दहिनी तथा॥ ८२<br>भीमास्या जालिनी चोषा शोषिणी रुद्रनायिका।<br>वीरभद्रा गणाध्यक्षा चन्द्रहासा च गह्वरा॥ ८३<br>गणमाताम्बिका चैव शक्तयः सर्वसम्मताः।<br>द्वितीयावरणे प्रोक्ताः षोडशैव यथाक्रमात्॥ ८४ | हे सुव्रत! अम्बिकाव्यूहका वर्णन कर दिया गया, अब श्रीव्यूहका श्रवण कीजिये। स्पर्शा, स्पर्शवती, गन्धा, प्राणा, अपाना, समाना, उदाना और व्याना—प्रथम आवरणकी ये आठ शक्तियाँ कही गयी हैं। उसी तरह तमोहता, प्रभा, अमोघा, तेजिनी, दहिनी, भीमास्या, जालिनी, उषा, शोषिणी, रुद्रनायिका, वीरभद्रा, गणाध्यक्षा, चन्द्रहासा, गह्वरा, गणमाता और अम्बिका—यथाक्रम ये सोलह सर्वसम्मत शक्तियाँ द्वितीय आवरणकी बतायी गयी हैं॥ ८१-८४॥ |
| श्रीव्यूहः कथितो भद्रं वागीशं शृणु सुव्रत।<br>धारा वारिधरा चैव वह्निकी नाशकी तथा॥ ८५<br>मर्त्यातीता महामाया वज्रिणी कामधेनुका।<br>प्रथमावरणेऽप्येवं शक्तयोऽष्टौ प्रकीर्तिताः॥ ८६<br>पयोष्णी वारुणी शान्ता जयन्ती च वरप्रदा।<br>प्लाविनी जलमाता च पयोमाता महाम्बिका॥ ८७<br>रक्ता कराली चण्डाक्षी महोच्छुष्मा पयस्विनी।<br>माया विद्येश्वरी काली कालिका च यथाक्रमम्॥ ८८<br>षोडशैव समाख्याताः शक्तयः सर्वसम्मताः।<br>व्यूहो वागीश्वरः प्रोक्तो गोमुखो व्यूह उच्यते॥ ८९ | हे सुव्रत! कल्याणकारी श्रीव्यूहका वर्णन कर दिया, अब वागीशव्यूहके विषयमें सुनिये। धारा, वारिधरा, वह्निकी, नाशकी, मर्त्यातीता, महामाया, वज्रिणी तथा कामधेनुका—ये आठ शक्तियाँ प्रथम आवरणकी बतायी गयी हैं। पयोष्णी वारुणी, शान्ता, वरप्रदायिनी जयन्ती, प्लाविनी, जलमाता, पयोमाता, महाम्बिका, रक्ता, कराली, चण्डाक्षी, महोच्छुष्मा, पयस्विनी, माया, विद्येश्वरी, काली, कालिका—क्रमसे ये सोलह सर्वसम्मत शक्तियाँ द्वितीय आवरणकी कही गयी हैं। वागीश नामक व्यूहका वर्णन कर दिया गया, अब गोमुखव्यूह बता रहा |