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श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished833 pages

Page 664 of 834

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Page 664

६६२ श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कृत्वा शिरसि तत्पात्रमर्घ्यं मूलेन दापयेत्।<br>अश्वमेधायुतं कृत्वा यत्फलं परिकीर्तितम्॥ २७<br><br>तत्फलं लभते दत्त्वा सौरार्घ्यं सर्वसम्मतम्।<br>दत्त्वैवार्घ्यं यजेद्भक्त्या देवदेवं त्र्यम्बकम्॥ २८<br><br>अथवा भास्करं चेष्ट्वा आग्नेयं स्नानमाचरेत्।<br>पूर्ववद्वै शिवस्नानं मन्त्रमात्रेण भेदितम्॥ २९घुटने भूमिपर टेककर देवदेव सूर्यको नमस्कार करके उस ताम्रपात्रको सिरसे लगाकर मूलमन्त्रके द्वारा अर्घ्य प्रदान करे। दस हजार अश्वमेधयज्ञ करनेपर जो फल बताया गया है, वह फल इस सर्वसम्मत सूर्यार्घ्य देनेसे प्राप्त हो जाता है। अर्घ्य प्रदान करके देवदेव त्र्यम्बक शिवकी भक्तिपूर्वक उपासना करनी चाहिये; अथवा सूर्यका पूजन करके शिवयजनके लिये अग्निस्रान (भस्मस्नान) करना चाहिये। [शिवपूजाके लिये] पूर्वकी भाँति (सूर्यस्नानकी भाँति) शिवस्नान करना चाहिये, इसमें केवल मन्त्रकी भिन्नता है॥ १६—२९॥
दन्तधावनपूर्वं च स्नानं सौरं च शाङ्करम्।<br>विघ्नेशं वरुणं चैव गुरुं तीर्थे समर्च्चयेत्॥ ३०<br><br>बद्ध्वा पद्मासनं तीर्थे तथा तीर्थं समर्च्चयेत्।<br>तीर्थं सङ्गृह्य विधिना पूजास्थानं प्रविश्य च॥ ३१<br><br>मार्गेणार्घ्यपवित्रेण तदाक्रम्य च पादुकम्।<br>पूर्ववत्करविन्यासं देहविन्यासमाचरेत्॥ ३२सूर्यस्नान तथा शिवस्नानके पूर्व दन्तधावन कर लेना चाहिये। तीर्थमें स्नान करके विघ्नेश्वर गणेश, वरुण तथा गुरुकी अर्चना करनी चाहिये। पुनः तीर्थमें पद्मासन लगाकर तीर्थकी विधिवत् पूजा करनी चाहिये। इसके बाद तीर्थजल लेकर खड़ाऊ धारण करके जलसे सिक्त पवित्र मार्गेसे पूजास्थानमें प्रवेशकर [आसनपर विधिवत् बैठकर] पूर्वकी भाँति करन्यास तथा देहन्यास करना चाहिये॥ ३०—३२॥
अर्घ्यस्य सादनं चैव समासात्परिकीर्तितम्।<br>बद्ध्वा पद्मासनं योगी प्राणायामं समभ्यसेत्॥ ३३अर्घ्यस्थापन संक्षेपमें आगे बताया गया है। योगीको चाहिये कि पद्मासन लगाकर प्राणायाम करे॥ ३३॥
रक्तपुष्पाणि सङ्गृह्य कमलाद्यानि भावयेत्।<br>आत्मनो दक्षिणे स्थाप्य जलभाण्डं च वामतः॥ ३४<br><br>ताम्रपात्राणि सौराणि सर्वकामार्थसिद्धये।<br>अर्घ्यपात्रं समादाय प्रक्षाल्य च यथाविधि॥ ३५<br><br>पूर्वोक्तेनाम्बुना सार्धं जलभाण्डे तथैव च।<br>अस्त्रोदकेन चैवार्घ्यमर्घ्यद्रव्यसमन्वितम्॥ ३६<br><br>संहितामन्त्रितं कृत्वा सम्पूज्य प्रथमेन च।<br>तुरीयेणावगुण्ठ्यैव स्थापयेदात्मनोपरि॥ ३७<br><br>पाद्यमाचमनीयं च गन्धपुष्पसमन्वितम्।<br>अम्भसा शोधिते पात्रे स्थापयेत्पूर्ववत्पृथक्।<br>संहितां चैव विन्यस्य कवचेनावगुण्ठ्य च॥ ३८<br><br>अर्घ्याम्बुना समभ्युक्ष्य द्रव्याणि च विशेषतः।<br>आदित्यं च जपेद्देवं सर्वदेवनमस्कृतम्॥ ३९कमल आदि रक्तपुष्पोंका संग्रह करके अपने दक्षिणभागमें रखकर वामभागमें जलपात्र स्थापितकर सूर्यकी भावना करे। सभी कामनाओंकी सिद्धिके लिये सूर्यार्घ्य आदिमें ताम्रपात्र उपयोगी हैं। अर्घ्यपात्र लेकर विधिपूर्वक उसका प्रक्षालन करके पूर्वोक्त जलके साथ अर्घ्यद्रव्यसमन्वित अर्घ्यको अस्त्रोदक मन्त्रसे अन्य जलभाण्डमें प्रदान करे। संहितामन्त्रसे अभिमन्त्रित करके सद्योजात मन्त्रसे पूजन करके चतुर्थ मन्त्र (तत्पुरुषमन्त्र)-से अवगुण्ठनकर अपने ऊपर स्थापित करना चाहिये। जलसे शुद्ध किये गये पात्रमें गन्ध-पुष्पयुक्त पाद्य तथा आचमनीय जलको पूर्वकी भाँति पृथक्-पृथक् स्थापित करना चाहिये। संहितामन्त्रसे न्यास करके तथा कवचसे अवगुण्ठन करके अर्घ्यजलसे विशेषरूपसे सभी द्रव्योंका प्रोक्षण करके सभी देवताओंसे नमस्कार किये जानेवाले आदित्य देवका [इस प्रकार] जप करना चाहिये॥ ३४—३९॥