श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished833 pages
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अध्याय २२ ] शिवदीक्षा-प्रकरणमें सौरस्नानविधि तथा भास्करार्चाका वर्णन ६५९
| एवं दीक्षा प्रकर्तव्या पूजा चैव यथाक्रमम्।<br>त्रिकालमेककालं वा पूजयेत्परमेश्वरम्॥ ७८ | (प्रातः, मध्याह्न, सायं) अथवा एक ही समय परमेश्वर शिवकी पूजा करनी चाहिये॥ ७६—७८॥ |
| अग्निहोत्रं च वेदाश्च यज्ञाश्च बहुदक्षिणाः।<br>शिवलिङ्गार्चनस्यैते कलांशेनापि नो समाः॥ ७९<br><br>सदा यजति यज्ञेन सदा दानं प्रयच्छति।<br>सदा च वायुभक्षश्च सकृद्योऽभ्यर्चयेच्छिवम्॥ ८०<br><br>एककालं द्विकालं वा त्रिकालं नित्यमेव वा।<br>येऽर्चयन्ति महादेवं ते रुद्रा नात्र संशयः॥ ८१<br><br>नारुद्रस्तु स्पृशेद्रुद्रं नारुद्रो रुद्रमर्चयेत्।<br>नारुद्रः कीर्तयेद्रुद्रं नारुद्रो रुद्रमाप्नुयात्॥ ८२<br><br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तो ह्यधिकारिविधिक्रमः।<br>शिवार्चनार्थं धर्मार्थकाममोक्षफलप्रदः॥ ८३ | अग्निहोत्र, समस्त वेद तथा बड़ी-बड़ी दक्षिणाओंवाले यज्ञ—ये सब शिवलिङ्गके अर्चनकी कलाके अंशके भी तुल्य नहीं हैं। जो एक बार शिवका अर्चन कर लेता है, वह मानो सदा यज्ञ करता है, सदा दान देता है और सदा वायुभक्षणरूप तपस्या करता है। जो लोग प्रतिदिन एक काल, दोनों कालों अथवा तीनों कालोंमें महादेवका पूजन करते हैं, वे रुद्ररूप ही हैं, इसमें सन्देह नहीं है। जो रुद्ररूप नहीं है; उसे रुद्रका स्पर्श नहीं करना चाहिये; जो रुद्ररूप नहीं है, उसे रुद्रकी पूजा नहीं करनी चाहिये और जो रुद्ररूप नहीं है, उसे रुद्रका नामकीर्तन नहीं करना चाहिये। जो रुद्ररूप नहीं है, वह रुद्रको नहीं प्राप्त कर सकता। [हे सनत्कुमार!] इस प्रकार मैंने [आपसे] संक्षेपमें शिवकी पूजाके लिये अधिकारी होने तथा उसकी विधिका क्रम कह दिया, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्षको प्रदान करनेवाला है॥ ७९—८३॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे दीक्षाविधिर्नामैकविंशतितमोऽध्यायः॥ २१॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'दीक्षाविधि' नामक इक्कीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २१॥
बाईसवाँ अध्याय
शिवदीक्षा-प्रकरणमें सौरस्नानविधि तथा भास्करार्चाका वर्णन
| शैलादिरुवाच<br>स्नानयागादिकर्माणि कृत्वा वै भास्करस्य च।<br>शिवस्नानं ततः कुर्याद्भस्मस्नानं शिवार्चनम्॥ १ | शैलादि बोले—[हे सनत्कुमार!] सूर्यस्नान-याग आदि कर्म करके ही शिवस्नान तदनन्तर भस्मस्नान और शिवार्चन करना चाहिये॥ १॥ |
| षष्ठेन मृदमादाय भक्त्या भूमौ न्यसेन्मृदम्।<br>द्वितीयेन तथाभ्युक्ष्य तृतीयेन च शोधयेत्॥ २<br><br>चतुर्थेनैव विभजेन्मलमेकेन शोधयेत्।<br>स्नात्वा षष्ठेन तच्छेषां मृदं हस्तगतां पुनः॥ ३<br><br>त्रिधा विभज्य सर्वं च चतुर्भिर्मध्यमं पुनः।<br>षष्ठेन सप्तवाराणि वामं मूलेन चालभेत्।<br>दशवारं च षष्ठेन दिशो बन्धः प्रकीर्तितः॥ ४ | छठे मन्त्र (ॐ तपः)—से मृत्तिका लेकर भक्तिपूर्वक भूमिपर स्थापित करे, दूसरे मन्त्र (ॐ भुवः)—से जलसे अभ्युक्षण करके तीसरे मन्त्र (ॐ स्वः)—से उसका शोधन करे। तत्पश्चात् चौथे मन्त्र (ॐ महः)—से मृत्तिकाका भाग करे और प्रथम मन्त्र (ॐ भूः)—से शरीरके मलका शोधन करे। तब छठे मन्त्र (ॐ तपः)—से स्नान करके पुनः शेष मृत्तिकाको हाथमें लेकर (ॐ भूः) आदि चारों मन्त्रोंसे उसके तीन भाग करके पुनः मध्य भागको छठें मन्त्रसे सात बार |