श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in context| ६४४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| पापैर्विमुच्यते सद्यो मुच्यते च न संशयः।<br>वीर्यमग्नेर्यतो भस्म वीर्यवान् भस्मसंयुतः ॥ ५७<br><br>भस्मस्नानरतो विप्रो भस्मशायी जितेन्द्रियः।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥ ५८<br><br>तस्मात्सर्वप्रयत्नेन भूत्यङ्गं पूजयेद्बुधः।<br>रेरेकारो न कर्तव्यस्तुन्तुन्कारस्तथैव च ॥ ५९<br><br>न तत्क्षमति देवेशो ब्रह्मा वा यदि केशवः।<br>मम पुत्रो भस्मधारी गणेशश्च वरानने ॥ ६० | विप्र भी पाशुपत हो जाता है। भस्मसे अनुलिप्त विद्वान् द्विज महापापोंसे होनेवाले दोषोंसे शीघ्र मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है। चूँकि अग्निका भस्म वीर्य (तेजरूप) होता है, अतः भस्म धारण करनेवाला वीर्यवान् (तेजस्वी) होता है। भस्मस्नानपरायण, भस्मशायी तथा जितेन्द्रिय विप्र सभी पापोंसे मुक्त होकर शिवसायुज्य प्राप्त करता है; अतः बुद्धिमान्को चाहिये कि अंगोंमें विभूति (भस्म) धारण करनेवालेकी पूजा करे, उनके प्रति ‘रे’ अथवा ‘तुम’ शब्द नहीं बोलना चाहिये; हे वरानने! इसे देवेश शिव सहन नहीं करते हैं, ऐसा कहनेवाले चाहे ब्रह्मा, विष्णु अथवा भस्मधारी मेरे पुत्र गणेश ही क्यों न हों? ॥ ५३-६०॥ |
| तेषां विरुद्धं यत्त्याज्यं स याति नरकार्णवम्।<br>गृहस्थो ब्रह्महीनोऽपि त्रिपुण्ड्रं यो न कारयेत् ॥ ६१<br><br>पूजा कर्म क्रिया तस्य दानं स्नानं तथैव च।<br>निष्फलं जायते सर्वं यथा भस्मनि वै हुतम् ॥ ६२<br><br>तस्माच्च सर्वकार्येषु त्रिपुण्ड्रं धारयेद्बुधः।<br>इत्युक्त्वा भगवान् ब्रह्मा स्तुत्वा देवैः समं प्रभुः ॥ ६३ | जो कुछ भी उन पाशुपतव्रत करनेवालोंके विरुद्ध हो, वह त्याज्य है; जो त्याग नहीं करता, वह नरकार्णवमें जाता है। तपस्या आदिसे रहित होते हुए भी जो गृहस्थ त्रिपुण्ड्र धारण नहीं करता है, उसके द्वारा की गयी पूजा, सत्कर्म, क्रिया, दान, स्नान—सब कुछ उसी भाँति निष्फल होता है, जैसे भस्ममें डाली गयी आहुति। अतः बुद्धिमान्को सभी सत्कर्मोंमें त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये ॥ ६१-६२ १/२ ॥ |
| भस्मच्छन्नैः स्वयं छन्नो विरराम विशाम्पते।<br>अथ तेषां प्रसादार्थं पशूनां पतिरीश्वरः ॥ ६४<br><br>सगणश्चाम्बया सार्धं सान्निध्यमकरोत्प्रभुः।<br>अथ सन्निहितं रुद्रं तुष्टुवुः सुरपुङ्गवम् ॥ ६५<br><br>रुद्राध्यायेन सर्वेशं देवदेवमुमापतिम्।<br>देवोऽपि देवानालोक्य घृणया वृषभध्वजः ॥ ६६<br><br>तुष्टोऽस्मीत्याह देवेभ्यो वरं दातुं सुरारिहा ॥ ६७ | हे विशाम्पते! इस प्रकार भस्ममाहात्म्य कहकर स्वयं भस्म धारण किये हुए प्रभु भगवान् ब्रह्मा भस्म धारण किये देवताओंके साथ शिवकी स्तुति करके [ध्यानानन्दमें मग्न होकर] शान्त हो गये। तदनन्तर उन देवताओंपर अनुग्रह करनेके लिये पशुपति प्रभु महेश्वर गणों तथा पार्वतीके साथ प्रकट हुए। इसके बाद वे देवता वहाँ उपस्थित सुरश्रेष्ठ, सर्वेश, देवदेव, उमापति रुद्रकी रुद्राध्यायसे स्तुति करने लगे। तब देवशत्रुओंका संहार करनेवाले भगवान् वृषभध्वजने कृपापूर्ण दृष्टिसे देवोंको देखकर ‘मैं देवताओंको वर प्रदान करनेके लिये सन्तुष्ट हूँ’—ऐसा कहा ॥ ६३-६७॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे पाशुपतव्रतमाहात्म्यवर्णनं नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'पाशुपतव्रतमाहात्म्यवर्णन' नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १८॥