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श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished833 pages

Page 628 of 834

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Page 628
६२६श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
जीवत्वेन स्थिते तस्मिन् शिवे सोमात्मके प्रभौ।<br>मधुरा विलयं याति सर्वलोकैकरक्षिणी॥ २७उन चन्द्ररूप भगवान् शिवके जीवरूपमें आत्मामें निश्चल हो जानेपर समस्त लोकोंपर एकमात्र शासन करनेवाली माया तिरोहित हो जाती है॥ २७॥
यजमानाह्वया मूर्तिः शैवी हव्यैरहर्निशम्।<br>पुष्णाति देवताः सर्वाः कव्यैः पितृगणानपि॥ २८शिवकी यजमान नामक मूर्ति हव्य द्रव्योंसे सभी देवताओं तथा कव्य द्रव्योंसे पितरोंको भी निरन्तर सन्तृप्त करती है॥ २८॥
यजमानाह्वया या सा तनुश्चाहुतिजा तया।<br>वृष्ट्या भावयति स्पष्टं सर्वमेव परापरम्॥ २९यजमान नामक जो [शिवकी] मूर्ति है, वह आहुतिजन्य वृष्टिसे सभी परापर पदार्थोंको उत्पन्न करती है—यह प्रसिद्ध ही है॥ २९॥
अन्तःस्थं च बहिःस्थं च ब्रह्माण्डानां स्थितं जलम्।<br>भूतानां च शरीरस्थं शम्भोर्मूर्तिर्गरीयसी॥ ३०ब्रह्माण्डोंके भीतर तथा बाहर व्याप्त जल तथा प्राणियोंके शरीरमें स्थित जल उन्हीं शिवकी श्रेष्ठ मूर्ति है॥ ३०॥
नदीनाममृतं साक्षान्नदानामपि सर्वदा।<br>समुद्राणां च सर्वत्र व्यापी सर्वमुमापतिः॥ ३१<br><br>सञ्जीविनी समस्तानां भूतानामेव पाविनी।<br>अम्बिका प्राणसंस्था या मूर्तिरम्बुमयी परा॥ ३२नदियों, नदों और समुद्रोंके अमृतमय सारे जलके रूपमें सर्वत्र उमापति शिव ही सर्वदा व्याप्त हैं। यह मूर्ति समस्त जीवोंको जीवन प्रदान करनेवाली तथा उन्हें पवित्र करनेवाली है। चन्द्ररूपा उमाके हृदयमें जो मूर्ति स्थित है, वह भगवान् शिवकी जलमयी परामूर्ति ही है॥ ३१-३२॥
अन्तःस्थश्च बहिःस्थश्च ब्रह्माण्डानां विभावसुः।<br>यज्ञानां च शरीरस्थः शम्भोर्मूर्तिर्गरीयसी॥ ३३<br><br>शरीरस्था च भूतानां श्रेयसी मूर्तिरैश्वरी।<br>मूर्तिः पावकसंस्था या शम्भोरत्यन्तपूजिता॥ ३४<br><br>भेदा एकोनपञ्चाशद्वेदविद्भिरुदाहृताः।<br>हव्यं वहति देवानां शम्भोर्यज्ञात्मकं वपुः॥ ३५<br><br>कव्यं पितृगणानां च हूयमानं द्विजातिभिः।<br>सर्वदेवमयं शम्भोः श्रेष्ठमग्न्यात्मकं वपुः॥ ३६<br><br>वदन्ति वेदशास्त्रज्ञा यजन्ति च यथाविधि।<br>अन्तःस्थो जगदण्डानां बहिःस्थश्च समीरणः॥ ३७ब्रह्माण्डोंके भीतर तथा बाहर व्याप्त और यज्ञविग्रहमें स्थित अग्नि भगवान् शिवकी श्रेष्ठ [अग्निरूप] मूर्ति ही है। जीवोंके शरीरमें भी जठराग्निरूपसे ईश्वर शिवकी कल्याणमयी मूर्ति ही विराजमान है। भगवान् शिवकी जो अग्निरूप मूर्ति है, वह अत्यन्त पूजित है। वेदवेत्ताओंने इसके उनचास भेद बताये हैं। भगवान् शिवका यह अग्निरूप विग्रह द्विजातियोंके द्वारा आहुति प्रदान किये जानेपर देवताओंके लिये हव्य तथा पितरोंके लिये कव्यका वहन करता है। वेद तथा शास्त्रोंको जाननेवाले भगवान् शिवकी अग्निरूप मूर्तिको सर्वदेवमय तथा श्रेष्ठ कहते हैं और विधिपूर्वक उसकी पूजा करते हैं॥ ३३-३६ १/२॥
शरीरस्थश्च भूतानां शैवी मूर्तिः पटीयसी।<br>प्राणाद्या नागकूर्माद्या आवहाद्याश्च वायवः॥ ३८<br><br>ईशानमूर्तेरेकस्य भेदाः सर्वे प्रकीर्तिताः।<br>अन्तःस्थं जगदण्डानां बहिःस्थं च वियद्विभोः॥ ३९ब्रह्माण्डोंके भीतर तथा बाहर स्थित और जीवोंके शरीरमें स्थित जो वायु है, वह शिवकी महिमामयी मूर्ति ही है। प्राण आदि, नाग-कूर्म आदि और आवह आदि वायु हैं; वे सब उसी एकमात्र शिवकी मूर्तिके भेद कहे गये हैं॥ ३७-३८ १/२॥
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