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श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished833 pages

Page 620 of 834

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Page 620
६१८श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| वचनं कुरुते वाक्यं नादानादि कदाचन।<br>शरीराणामशेषाणां तस्य देवस्य शासनात्॥ १६<br><br>करोति पाणिरादानं न गत्यादि कदाचन।<br>सर्वेषामेव जन्तूनां नियमादेव वेधसः॥ १७<br><br>विहारं कुरुते पादो नोत्सर्गादि कदाचन।<br>समस्तदेहिबृन्दानां शिवस्यैव नियोगतः॥ १८<br><br>उत्सर्गं कुरुते पायुर्र्न वदेत कदाचन।<br>जन्तोजातस्य सर्वस्य परमेश्वरशासनात्॥ १९<br><br>आनन्दं कुरुते शश्वदुपस्थं वचनाद्विभोः।<br>सर्वेषामेव भूतानामीश्वरस्यैव शासनात्॥ २० | ही शब्द-स्पर्श आदि जो भी हैं, वे अपने-अपने विषयोंमें व्यवहार करते हैं। उन्हीं भगवान् शिवके आदेशसे सभी देहधारियोंकी वाणी बोलनेका काम करती है; वह ग्रहण आदिका कार्य कभी नहीं करती। उन्हीं शिवके [बनाये गये] नियमसे ही सभी प्राणियोंका हाथ ग्रहणका कार्य करता है, वह चलने-फिरनेका कार्य कभी नहीं कर सकता। शिवके आदेशसे सभी प्राणिसमुदायका पैर गमनकार्य करता है, वह [मल आदिका] उत्सर्जन कभी नहीं कर सकता। उन परमेश्वरके आदेशसे सम्पूर्ण प्राणिसमुदायका गुदास्थल उत्सर्जन-कार्य करता है, वह बोलनेका कार्य कभी नहीं करता। उन्हीं सर्वव्यापी ईश्वरके वचन तथा आदेशसे सभी प्राणियोंकी जननेन्द्रिय सदा आनन्द प्रदान करती है॥ १३—२०॥ |
| अवकाशमशेषाणां भूतानां सम्प्रयच्छति।<br>आकाशं सर्वदा तस्य परमस्यैव शासनात्॥ २१<br><br>निर्देशेन शिवस्यैव भेदैः प्राणादिभिर्निजैः।<br>बिभर्ति सर्वभूतानां शरीराणि प्रभञ्जनः॥ २२<br><br>निर्देशाद्देवदेवस्य सप्तस्कन्धगतो मरुत्।<br>लोकयात्रां वहत्येव भेदैः स्वैरावहादिभिः॥ २३<br><br>नागाद्यैः पञ्चभिर्भेदैः शरीरेषु प्रवर्तते।<br>अपदेशेन देवस्य परमस्य समीरणः॥ २४ | उन्हीं परमेश्वरके आदेशसे आकाश सभी प्राणियोंको अवकाश प्रदान करता है। उन्हीं शिवके निर्देशसे अपने प्राण आदि भेदोंसे प्रभंजन (वायु) सभी प्राणियोंके शरीरको धारण करता है। सात स्कन्धोंवाला मरुत् उन्हीं देवदेवके निर्देशपर अपने आवह आदि भेदोंसे स्थित होकर लोकयात्रा करता है। यही वायु परम प्रभु शिवकी आज्ञासे नाग आदि पाँच भेदोंसे शरीरोंमें विद्यमान रहता है॥ २१—२४॥ |
| हव्यं वहति देवानां कव्यं कव्याशिनामपि।<br>पाकं च कुरुते वह्निः शङ्करस्यैव शासनात्॥ २५<br><br>भुक्तमाहारजातं यत्पचते देहिनां तथा।<br>उदरस्थः सदा वह्निर्विश्वेश्वरनियोगतः॥ २६ | शंकरकी आज्ञासे ही अग्नि देवताओंके लिये हव्य तथा पितरोंके लिये कव्यका वहन करती है और भोजनका परिपाक करती है। उदरमें स्थित अग्नि उन विश्वेश्वरके ही आदेशसे प्राणियोंके द्वारा ग्रहण किये गये सम्पूर्ण आहारको पचाती है। |
| सञ्जीवयन्त्यशेषाणि भूतान्यापस्तदाज्ञया।<br>अविल्लङ्घ्या हि सर्वेषामाज्ञा तस्य गरीयसी॥ २७<br><br>चराचराणि भूतानि बिभर्त्येव तदाज्ञया।<br>आज्ञया तस्य देवस्य देवदेवः पुरन्दरः॥ २८ | जल उन्हींकी आज्ञासे सभी प्राणियोंको जीवन प्रदान करता है। उनकी श्रेष्ठ आज्ञा सबके लिये अनुल्लंघनीय है। पृथ्वी उन्हींकी आज्ञासे चराचर जीवोंको धारण करती है और उन्हीं देव शिवकी आज्ञासे इन्द्र भी सभी प्राणियोंका पालन करते हैं। |
| जीवतां व्याधिभिः पीडां मृतानां यातनाशतैः।<br>विश्वम्भरः सदाकालं लोकैः सर्वैरलङ्घ्यया॥ २९<br><br>देवान् पात्यसुरान् हन्ति त्रैलोक्यमखिलं स्थितः।<br>अधार्मिकाणां वै नाशं करोति शिवशासनात्॥ ३० | यमराज भी उन्हीं शिवकी आज्ञासे जीवित प्राणियोंको व्याधियोंसे तथा मृतलोगोंको सैकड़ों प्रकारकी यातनाओंसे कष्ट प्रदान करते हैं। तीनों लोकोंमें हर समय विद्यमान रहकर भगवान् विष्णु उन्हीं शिवकी सभी लोगोंके द्वारा |