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श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished833 pages

Page 592 of 834

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Page 592
५९०श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कन्यां तां रममाणां वै मेघमध्ये शतह्रदाम्।<br>प्राह तां प्रेक्ष्य भगवान्नारदः सस्मितस्तदा॥ ५५<br><br>केयं राजन् महाभागा कन्या सुरसुतोपमा।<br>ब्रूहि धर्मभृतां श्रेष्ठ सर्वलक्षणशोभिता॥ ५६मेघमें विद्युत्के समान प्रतीत होनेवाली उस कन्याको क्रीड़ा करती हुई देखकर भगवान् नारदने मुसकराकर राजासे कहा— हे राजन्! महाभाग्यशालिनी, देवकन्याके सदृश तथा सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न यह बाला कौन है? हे धर्मधारियोंमें श्रेष्ठ! यह बताइये॥ ५५-५६॥
राजोवाच<br>दुहितेयं मम विभो श्रीमती नाम नामतः।<br>प्रदानसमयं प्राप्ता वरमन्वेषते शुभा॥ ५७राजा बोले— हे विभो! यह मेरी पुत्री है, जो श्रीमती नामसे प्रसिद्ध है। यह विवाह-कालको प्राप्त हो चुकी है, अतः यह सौभाग्यशालिनी वरका अन्वेषण कर रही है॥ ५७॥
इत्युक्तो मुनिशार्दूलस्तामैच्छन्नारदो द्विजाः।<br>पर्वतोऽपि मुनिस्तां वै चकमे मुनिसत्तमाः॥ ५८हे ऋषियो! राजाके ऐसा कहनेपर मुनिश्रेष्ठ नारद उसे प्राप्त करनेकी इच्छा करने लगे और हे श्रेष्ठ मुनियो! इसी तरह पर्वतमुनि भी उसे पानेकी प्रबल कामना करने लगे॥ ५८॥
अनुज्ञाप्य च राजानं नारदो वाक्यमब्रवीत्।<br>रहस्याहूय धर्मात्मा मम देहि सुतामिमाम्॥ ५९<br><br>पर्वतो हि तथा प्राह राजानं रहसि प्रभुः।<br>तावुभौ सह धर्मात्मा प्रणिपत्य भयार्दितः॥ ६०राजाकी अनुमति प्राप्तकर धर्मात्मा नारदने उन्हें एकान्तमें बुलाकर यह बात कही—'अपनी इस पुत्रीको मुझे दे दीजिये।' पर्वतमुनिने भी राजासे एकान्तमें वैसा ही कहा॥ ५९ १/२॥<br><br>तब भयसे व्याकुल राजाने उन दोनोंको एक साथ प्रणाम करके कहा—आप दोनों ही मेरी कन्याकी
उभौ भवन्तौ कन्यां मे प्रार्थयानौ कथं त्वहम्।<br>करिष्यामि महाप्राज्ञ शृणु नारद मे वचः॥ ६१