श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished833 pages
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| ५८४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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चौथा अध्याय
वासुदेवपरायण विष्णुभक्तोंके लक्षण तथा उनकी महिमा
| ऋषय ऊचुः<br>वैष्णवा इति ये प्रोक्ता वासुदेवपरायणाः।<br>कानि चिह्नानि तेषां वै तन्नो ब्रूहि महामते॥ १<br>तेषां वा किं करोत्येष भगवान् भूतभावनः।<br>एतन्मे सर्वमाचक्ष्व सूत सर्वार्थवित्तम॥ २ | **ऋषिगण बोले—**हे महामते! जो वासुदेवपरायण वैष्णव कहे गये हैं, उनके क्या लक्षण हैं; उसे हमें बताइये। हे सूत! हे सर्वतत्त्वज्ञ! भगवान् भूतभावन उन्हें कौन-सी गति प्रदान करते हैं; यह सब हमसे कहिये॥ १-२॥ |
| सूत उवाच<br>अम्बरीषेण वै पृष्टो मार्कण्डेयः पुरा मुनिः।<br>युष्माभिरद्य यत् प्रोक्तं तद्ददामि यथातथम्॥ ३ | **सूतजी बोले—**आपलोगोंने आज मुझसे जो पूछा है, वही बात पूर्वकालमें अम्बरीषने मार्कण्डेयमुनिसे पूछी थी; [उस समय उन्होंने जो कहा था] उसे मैं यथार्थ रूपसे आपलोगोंको बता रहा हूँ॥ ३॥ |
| मार्कण्डेय उवाच<br>शृणु राजन् यथान्यायं यन्मां त्वं परिपृच्छसि।<br>यत्रास्ते विष्णुभक्तस्तु तत्र नारायणः स्थितः॥ ४<br>विष्णुरेव हि सर्वत्र येषां वै देवता स्मृता।<br>कीर्त्यमाने हरौ नित्यं रोमाञ्चो यस्य वर्तते॥ ५<br>कम्पः स्वेदस्तथाक्षेषु दृश्यन्ते जलबिन्दवः।<br>विष्णुभक्तिसमायुक्तान् श्रौतस्मार्तप्रवर्तकान्॥ ६<br>प्रीतो भवति यो दृष्ट्वा वैष्णवोऽसौ प्रकीर्तितः।<br>नान्यदाच्छादयेद्वस्त्रं वैष्णवो जगतोऽरणे॥ ७ | **मार्कण्डेयजी बोले—**हे राजन्! आप मुझसे जो पूछ रहे हैं, उसे ध्यानपूर्वक सुनिये। जहाँ विष्णुभक्त रहता है, वहींपर नारायण विराजमान रहते हैं। जिनके लिये सर्वत्र विष्णु ही देवता कहे गये हैं, भगवान् श्रीहरिका कीर्तन होते समय जिसके शरीरमें सदा रोमांच होने लगता है, कम्पन उत्पन्न हो जाता है, पसीना आने लगता है और नेत्रोंमें अश्रु दिखायी पड़ने लगते हैं; विष्णुकी भक्तिसे युक्त श्रौत-स्मार्त कर्मप्रवर्तक विद्वानोंको देखकर जो आनन्दित हो उठता है, उसे वैष्णव कहा गया है। जगत्के दर्शनमें [अपनी रक्षाके निमित्त] वैष्णवको आवश्यक परिधानके अतिरिक्त वस्त्र आदिसे शरीरका आवरण नहीं करना चाहिये॥ ४-७॥ |
| विष्णुभक्तमथायान्तं यो दृष्ट्वा सम्मुखस्थितः।<br>प्रणामादि करोत्येवं वासुदेवे यथा तथा॥ ८<br>स वै भक्त इति ज्ञेयः स जयी स्याज्जगत्त्रये।<br>रूक्षाक्षराणि शृण्वन् वै तथा भागवतेरितः॥ ९<br>प्रणामपूर्वं क्षान्त्या वै यो वदेद्वैष्णवो हि सः। | विष्णुभक्तको आता हुआ देखकर जो सामने खड़े होकर उसे वासुदेवतुल्य समझकर प्रणाम आदि करता है, उसे वैष्णव भक्त जानना चाहिये; वह तीनों लोकोंमें विजयी होता है। कठोर वचन सुनता हुआ भी जो भगवद्भावसे युक्त होकर प्रणामपूर्वक धैर्यके साथ बोलता है, वही वैष्णव है॥ ८-९ १/२ ॥ |
| गन्धपुष्पादिकं सर्वं शिरसा यो हि धारयेत्॥ १०<br>हरेः सर्वमितीत्येवं मत्त्वासौ वैष्णवः स्मृतः।<br>विष्णुक्षेत्रे शुभान्येव करोति स्नेहसंयुतः॥ ११<br>प्रतिमां च हरेर्नित्यं पूजयेत्प्रयतात्मवान्।<br>विष्णुभक्तः स विज्ञेयः कर्मणा मनसा गिरा॥ १२<br>नारायणपरो नित्यं महाभागवतो हि सः।<br>भोजनाराधनं सर्वं यथाशक्त्या करोति यः॥ १३ | सब कुछ श्रीहरिका है—ऐसा मानकर जो गन्ध, पुष्प आदिको सिरसे लगाता है, वह वैष्णव कहा गया है। जो विष्णुक्षेत्रमें प्रेमयुक्त होकर शुभ कर्म ही करता है और एकाग्रचित्त होकर श्रीहरिकी प्रतिमाका नित्य पूजन करता है, उसे मन-वाणी-कर्मसे विष्णुभक्त समझना चाहिये। जो सदा नारायणमें अनुरक्त है, वह परमभागवत है॥ १०-१२ १/२ ॥ |