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श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished833 pages

Page 547 of 834

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Page 547

| अध्याय १०३ ] | भगवान् शिव एवं पार्वतीके विवाहकी मांगलिक कथा | ५४५ |
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संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अभ्ययुः शङ्खवर्णाश्च गणकोट्यो गणेश्वराः।<br>दशभिः केकराक्षश्च विद्युतोऽष्टाभिरेव च॥ १३<br><br>चतुःषष्ट्या विशाखाश्च नवभिः पारयात्रिकः।<br>षड्भिः सर्वान्तकः श्रीमान् तथैव विकृताननः ॥ १४<br><br>ज्वालाकेशो द्वादशभिः कोटिभिर्गणपुङ्गवः।<br>सप्तभिः समदः श्रीमान् दुन्दुभोऽष्टाभिरेव च ॥ १५<br><br>पञ्चभिश्च कपालीशः षड्भिः सन्दारकः शुभः।<br>कोटिकोटिभिरेवेह गण्डकः कुम्भकस्तथा ॥ १६शंखके समान वर्णवाले गणेश्वर [अपने] करोड़ों गणोंके साथ पहुँचे। केकराक्ष दस करोड़ गणोंके साथ, विद्युत आठ करोड़ गणोंके साथ, विशाख चौंसठ करोड़ गणोंके साथ, पारयात्रिक नौ करोड़ गणोंके साथ, श्रीमान् सर्वान्तक छः करोड़ गणोंके साथ, विकृतानन भी छः करोड़ गणोंके साथ, गणोंमें श्रेष्ठ ज्वालाकेश बारह करोड़ गणोंके साथ, श्रीमान् समद सात करोड़ गणोंके साथ, दुन्दुभ आठ करोड़ गणोंके साथ, कपालीश पाँच करोड़ गणोंके साथ, उत्तम संदारक छः करोड़ गणोंके साथ और गण्डक तथा कुम्भक करोड़ों-करोड़ों गणोंके साथ आये ॥ १३-१६॥
विष्टम्भोऽष्टाभिरेवेह गणपः सर्वसत्तमः।<br>पिप्पलश्च सहस्रेण सन्नादश्च तथा द्विजाः ॥ १७<br><br>आवेष्टनस्तथाष्टाभिः सप्तभिश्चन्द्रतापनः।<br>महाकेशः सहस्रेण कोटीनां गणपो वृतः ॥ १८हे द्विजो ! सर्वश्रेष्ठ गणेश्वर विष्टम्भ आठ करोड़ गणोंके साथ और पिप्पल तथा सन्नाद एक-एक हजार करोड़ गणोंके साथ आये। आवेष्टन [नामक गणेश्वर] आठ करोड़ गणोंके साथ, चन्द्रतापन सात करोड़ गणोंके साथ और गणेश्वर महाकेश हजार करोड़ गणोंके साथ आये ॥ १७-१८॥
कुण्डी द्वादशभिर्वीरस्तथा पर्वतकः शुभः।<br>कालश्च कालकश्चैव महाकालः शतेन वै ॥ १९<br><br>आग्निकः शतकोट्या वै कोट्याग्निमुख एव च।<br>आदित्यमूर्धा कोट्या च तथा चैव धनावहः॥ २०पराक्रमशाली [गणेश्वर] कुण्डी तथा शुभ पर्वतक बारह करोड़ गणोंके साथ और काल, कालक तथा महाकाल सौ करोड़ गणोंके साथ आये। आग्निक सौ करोड़ गणोंके साथ तथा अग्निमुख एक करोड़ गणोंके साथ आये। उसी प्रकार आदित्यमूर्धा तथा धनावह [नामक गणेश्वर] भी एक करोड़ गणोंके साथ आये ॥ १९-२०॥
सन्नामश्च शतेनैव कुमुदः कोटिभिस्तथा।<br>अमोघः कोकिलश्चैव कोटिकोट्या सुमन्त्रकः ॥ २१<br><br>काकपादोऽपरः षष्ट्या षष्ट्या सन्तानकः प्रभुः।<br>महाबलश्च नवभिर्मधुपिङ्गश्च पिङ्गलः ॥ २२<br><br>नीलो नवत्या देवेशः पूर्णभद्रस्तथैव च।<br>कोटीनां चैव सप्तत्या चतुर्वक्त्रो महाबलः ॥ २३<br><br>कोटिकोटिसहस्राणां शतैर्विंशतिभिर्वृताः।<br>तत्राजग्मुस्तथा देवास्ते सर्वे शङ्करं भवम् ॥ २४सन्नाम तथा कुमुद सौ करोड़ गणोंके साथ आये। अमोघ, कोकिल तथा सुमन्त्रक करोड़-करोड़ गणोंके साथ आये। दूसरे गणेश्वर काकपाद साठ करोड़ गणोंके साथ, प्रभुतासम्पन्न सन्तानक साठ करोड़ गणोंके साथ और महाबल, मधु, पिंग तथा पिंगल नौ करोड़ गणोंके साथ आये। नील, देवेश तथा पूर्णभद्र नब्बे करोड़ गणोंके साथ और महाबलशाली चतुर्वक्त्र सत्तर करोड़ गणोंके साथ आये। वे सभी देव अपने बीस सौ हजार करोड़ गणोंसे घिरे हुए वहाँ भगवान् शंकरके पास पहुँचे ॥ २१-२४॥