श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished833 pages
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अध्याय १०२ ] पार्वतीकी तपस्यासे प्रसन्न हो भगवान् शिवका उन्हें वरदान देना ५४३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तत एवं प्रसन्ने तु सर्वदेवनिवारणम्।<br>वपुश्चकार देवेशो दिव्यं परममद्भुतम्॥ ५४॥ | प्रसन्न हो गये और उन प्रभुने ब्रह्माके वचनानुसार सबको पूर्वकी भाँति कर दिया॥ ५३॥<br>इस प्रकार प्रसन्न हो जानेपर उन देवेश्वरने सभी देवताओंके द्वारा न देखे जा सकनेवाला, दिव्य तथा परम अद्भुत शरीर धारण किया॥ ५४॥ |
| तेजसा तस्य देवास्ते सेन्द्रचन्द्रदिवाकराः।<br>सब्रह्मकाः ससाध्याश्च सनारायणकास्तथा॥ ५५॥<br><br>सयमाश्र्च सरुद्राश्च चक्षुरप्रार्थयन् विभुम्।<br>तेभ्यश्च परमं चक्षुः सर्वदृष्टौ च शक्तिमत्॥ ५६॥ | तब उनके तेजसे इन्द्र, चन्द्र, सूर्य, ब्रह्मा, साध्यगण, नारायण, यम, सभी रुद्र आदिके सहित वे देवता प्रतिहत (नष्ट) दृष्टिवाले हो गये। तब उन लोगोंने प्रभुसे [दिव्य] दृष्टिके लिये प्रार्थना की। इसपर उमापति शर्वने उन्हें सब कुछ देखनेमें समर्थ दिव्य दृष्टि प्रदान की; साथ ही उन्होंने भवानी तथा हिमालयको भी दिव्य दृष्टि दी॥ ५५-५६ १/२॥ |
| ददावम्बापतिः शर्वो भवान्याश्च चलस्य च।<br>लब्ध्वा चक्षुस्तदा देवा इन्द्रविष्णुपुरोगमाः॥ ५७॥<br><br>सब्रह्मकाः सशक्राश्च तमपश्यन् महेश्वरम्।<br>ब्रह्माद्या नेमिरे तूर्णं भवानी च गिरीश्वरः॥ ५८॥<br><br>मुनयश्च महादेवं गणेशाः शिवसम्मताः।<br>ससृजुः पुष्पवृष्टिं च खेचराः सिद्धचारणाः॥ ५९॥<br><br>देवदुन्दुभयो नेदुस्तुष्टुवुर्मुनयः प्रभुम्।<br>जगुर्गन्धर्वमुख्याश्च ननृतुश्चाप्सरोगणाः॥ ६०॥<br><br>मुमुहुर्गणपाः सर्वे मुमोदाम्बा च पार्वती।<br>तस्य देवी तदा हृष्टा समक्षं त्रिदिवौकसाम्॥ ६१॥ | तब दिव्य दृष्टि प्राप्त करके ब्रह्मा तथा शक्र-सहित इन्द्र, विष्णु आदि प्रधान देवताओंने उन महेश्वरका दर्शन किया। ब्रह्मा आदि देवताओं, भवानी (पार्वती), गिरीश्वर [हिमालय], मुनियों तथा शिवप्रिय गणेश्वरोंने शीघ्र ही महादेवको प्रणाम किया। आकाशचारी सिद्धों तथा चारणोंने [उनपर] पुष्पवृष्टि की, देवदुन्दुभियाँ बजने लगीं, मुनिगण प्रभुकी स्तुति करने लगे, प्रधान गन्धर्व गाने लगे तथा अप्सराएँ नाचने लगीं, सभी गणेश्वर आनन्दित हो उठे और अम्बा पार्वती भी आनन्दविभोर हो गयीं॥ ५७-६० १/२॥<br><br>उस समय आह्लादित देवी [पार्वती]-ने त्रिदेवोंके |
| पादयोः स्थापयामास मालां दिव्यां सुगन्धिनीम्।<br>साधु साध्विति सम्प्रोच्य तया तत्रैव चार्चितम्॥ ६२॥ | समक्ष उन शिवके चरणोंमें दिव्य तथा सुगन्धित माला |